शनिवार, 1 जुलाई 2017

जिन्द्गी

 
जिन्दगी
कल खो दिया आज के लिए
आज खो दिया कल के लिए
कभी जी ना सके हम आज के लिए
बीत रही है जिन्दगी
कल आज और कल के लिए.

      दोस्तों आज मेरा जन्म दिन भी  है, मैंने आज  66 वर्ष पूरे कर लिए ...

गुरुवार, 5 मार्च 2015

होली से पहले

holi animated scraps, graphics फिर से होली आई रस बरसाते रंगों के संग, फिर से आई होली , फागुन का त्यौहार निराला भर लो अपनी झोली ! मौज मनाए मिल-जुल कर आओ खेल रचाए , लें गुलाल लें रंग फाग का सबसे प्रेम बढाए ! चारों ओर लगा है मेला मौसम बना रंसीला , स्नेह रंग की ऋतू आई कर लो तनमन गीला ! पिचकारी का रंग उड़ाएं हँसकर करे ठिठोली , ऊँची नीच का भेद भुलाऐ बन जाऐ हमजोली ! हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, हम सब भाई- भाई , आपस के मतभेद भुला दो फिर से होली आई ! धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

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होली से पहले

ज़रा सा  मुस्करा  देना होली  मनाने  से पहले 
हर गम को जला  देना होली  जलाने से पहले 
 मत  सोचना  किसने दिल दुखाया है अब तक, 
   सबको  माफ़  कर  देना  रंग  लगाने  से पहले !  

क्या  पता  फिर  ये  मौक़ा  मिले  या  न  मिले 
इसलिए दिल को साफ़ कर लेना होली से पहले 
 कहीं ये सन्देश  पहले कोई  आपको  न  भेज दे, 
  होली की शुभकामनाए ले लीजिये  हमसे पहले !  
 

रविवार, 1 मार्च 2015

खुशखबरी

खुशखबरी
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जनपद सदस्य  के पद हेतु 
  11 प्रत्यासियों के बीच कड़े मुकाबले में  3997  वैध मतों   
में अपने  मित्रों के सहयोग से 850 मत  पाकर 36 मतों 
से चुनाव जीतने में कामयाब रहा | अपने सभी दोस्तों से 
अनुरोध है कि ईश्वर से विनय करे की मै अपने कर्तव्यों 
का निर्वहन निष्ठापूर्वक ईमानदारी से  कर सकूँ |


मंगलवार, 25 नवंबर 2014

जाड़े की धूप

 

 जाड़े की धूप

जाड़े की धुप
टमाटर का सूप,
मूंगफली के दाने
छुट्टी के बहाने,
तबीयत नरम 
पकौड़े गरम,
ठंडी हवा 
मुह में धुंआ,
फाटे हुए गाल
सर्दी से बेहाल,
तन पर पड़े  
ऊनी कपडे,
दुबले भी लगते 
मोटे तगड़े,
किटकिटाते दांत 
ठिठुरते ये हाथ,
जलता अलाव 
हांथों का सिकाव,
गुदगुदा बिछौना
रजाई में सोना,
सुबह का होना 
सपनो में खोना,
 
 


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

दीप जलाये .

 दीप जलायें
खेतों में  दीप जलाये  कृषकों  ने  नई फसल के !
  दरिद्रता का घना अन्धेरा मिटा इसी के बल से !! 

चारो ओर धरा है जगमग ,आज सुहानी लगती !
 खुशहाली  के गीत गूँजते, नई आशाऐ  जगती !! 

हरवाहे  किसान महिलाएं, श्रम की माल पिरोती !
 दीपपर्व पर  कर न्योछावर,आज खुशी  के मोती !!

लक्ष्मी-सुत, लक्ष्मी का  वंदन  दीपावली  में  करता !
  जला  जला  माटी  के  दीपक, आज अन्धेरा  हरता !!

 
घर आनाज तो सदा दिवाली,संभव किसान है करता !
 लक्ष्मी-सुत  इसलिए  वही  है,खेतों में  स्वर्ण बरसता !!
 
धान,ज्वार,बाजरा,उड़द, मक्का की जब फासले आती !
 करे  किसान  फसल का  स्वागत, वे उसके गुण गाती !!

जितना उजला प्रकाश पूनम का उतनी काल निशा  है !
अंतर मिटा आज  ही  केवल ,यद्दपि विपरीत  दिशा है !!

श्रम  के दीप जलाकर लेकिन किसान प्रकाश है लाता !
 उसकी मेहनत प्रबल साधना से ही सारा जग है खाता !! 
dheerendra singh bhadauriya

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

वजूद



काश- तुम्हारे भी एक बेटी होती
प्यार से उसका नाम रखते ज्योती,
सहमी सहमी सिमटी सी-
गुलाबी कपड़ों लिपटी सी-
टुकुर टुकुर निहारती,
जैसे बेरहम दुनिया को देखना चाहती,
उसका हंसना बोलना और मुस्कराना,
तुम्हारा प्यार से माथे को सहलाना,
गाल चूमकर नाम से बुलाते-
गोद में उठाकर सीने से लगाते-
तो तुम्हरा दिल खुशियों से नाच उठता,
कितनी ठंडक पडती कितना सकून मिलता,
नन्हे नन्हे पैरों से चलने की आहट

हंसना रोना और उसकी खिलखिलाहट,
गोद में उठाकर लोरी सुनना
उंगली पकडकर चलना सिखाना,
तोतली जबान से कुछ कहने की चाहत
समाज के दोगली बातों से आहात-
जैसे कहना चाह रही हो-?
बेटे और बेटी में इतना फर्क,
इसमें हम बेटियों का क्या कसूर
एक बार हमारे पंख लगाकर के देखो
खुले आसमान में उड़ाकर के देखो-
हम क्या नहीं कर सकती॥?
लक्ष्मीबाई, से लेकर मदरटेरसा, तक
इंदिरा गांधी,से लेकर कल्पना चावला तक
ये भी तो किसी की बेटियां थी,
बेटियां समाज की धडकन होती है
दो कुलों के बीच रिश्ता जोड़कर-
घर बसाती है,
माँ बनकर इंसानी रिश्तों की
भावनाओ से जुडना सिखाती है,
पर तुमने-?
पर जमने से पहले ही काट डाला
शरीर में जान-?
पड़ने से पहले ही मार डाला,
आश्चर्य है.?
खुद को खुदा कहने लगे हो
प्रकृति और ईश्वर से
बड़ा समझने लगे हो,
तुम्हारे पास नहीं है ?
कोई हमसे बड़ा सबूत,
हम बेटियां न होती-?
न होता तुम्हारा वजूद......

जिन्दगी के  हर जशन को अधूरा पाओगे,
अगर बेटियों के आगमन से इतना कतराओगे,
जीवन का ये अनमोल सुख कैसे पाओगे,,,,,,,,

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dheerendra singh bhadauriya,,,,,

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

आज के दोहे.

आज के दोहे.

नई  सदी  से  मिल  रही,  दर्द  भरी  सौगात   
बेटा   कहता   बाप  से , तेरी   क्या  औकात !!

अब  तो अपना  खून भी, करने लगा कमाल    
बोझ समझ माँ बाप को, घर से रहा निकाल !!

 पानी आँख में  न रहा, शरम  बची  ना लाज     
कहे   बहू  अब  सास  से, घर  में  मेरा  राज !!

भाई   भी  करता   नही, भाई  पर  विस्वास   
 बहन  पराई   हो   गई,  साली  खासमखास !!

मंदिर  में  पूजा  करें,  घर   में   करे  कलेश   
 बापू  तो   बोझा  लगे, पत्थर   लगे   गणेश !!

बचे  कहाँ   वो  लोग  है, बचा  कहाँ  ईमान   
 पत्थर के  भगवान्  हैं, पत्थर  दिल  इंसान !!

फैला   है  पाखंड  का, अन्धकार  सब  ओर  
 पापी  करते  जागरण, मचा  मचाकर  शोर !!

रचना whatsApp से

शनिवार, 28 जून 2014

ब्लोगिंग के तीन साल,


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

ब्लोगिंग के तीन साल,

 

  तीन  साल   लिखते   हुआ ,"काव्यान्जली " में  पोस्ट   
दो  सौ  अडसठ  मिल  गए, अब  तक  मुझको  दोस्त, 


 अब तक मुझको दोस्त,दोसौ पांच रचनाये लिख डाली   
दस  हजार एक  सौ  छियान्बे , टिप्पणियाँ  भी  पाली, 


 एक  लाख  पाठको  का  मिला , मुझको  स्नेह  अपार   
 सभी    स्नेही   ब्लागरों    का ,  बहुत   बहुत   आभार,  

 

 २८ जून २०११ से आज तक उन सभी ब्लॉगरों का आभारी हूँ,जिन्होंने मेरे पोस्ट पर आकर अपनी अनमोल टिप्पणियों से मेरा हौसला बढ़ाया, आशा करता हूँ आगे भी इसी तरह प्यार स्नेह बनाए रखेगें,,,


मेरी लिखी कुछ रचनाओं के पसंदीदा  लिंक्स,,,,,



1 -...: स्वागत गीत....

2 - ...: बेटी,,,,,

3 - ...: ऐसे रात गुजारी हमने....

4 -...: कवि,...

5 - ...: आँसुओं की कीमत....

6 - ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

7 -...: तुम्हारा चेहरा....

8 -...: तब मधुशाला हम जाते है,...

9 - ...: बसंती रंग छा गया,...

10 - ...: होली में ....

11 - ...: कामयाबी....

12 - ...: हमको भी तडपाओगे....

13 - ...: जिन्दगीं....

14 -...: जनता सबक सिखायेगी....

15 - ...: शब्द....

16 - ...: हम दो हमारे दो ....

17 -...: वजूद....

18 -...: माँ की यादें....
 

19 -...: एक बूँद ओस की....
 
20 - ...: वाह गाँधी....

dheerendra bhadauriya

मंगलवार, 20 मई 2014

प्यारी सजनी

प्यारी  सजनी

तुम  न्यारी तुम  प्यारी  सजनी
लगती  हो  पर- लोक  की  रानी
  नख  से  शिख   तक  तुम  जादू  
 फूलों  सी  लगती   तेरी  जवानी,

केशों    में    सजता    है  गजरा
नैनों   में   इठलाता  है   कजरा
खोले   केश   सुरभि  है   बिखरे
 झुके  नैन   रच   जाए   कहानी,


माथे पर  सौभाग्य  की  बिंदिया
जिसके गिरफ्त में मेरी निदिया
 पहने  कानों में  चन्दा  से कुंडल 
  और  तन  पर भाये  चूनर धानी, 

कर  कमलों  में  कंगना   सजते
पैरों   में  बिछिया  नूपुर   बजते
 संगीत  तेरे  आभूषणों  का  सुन 
 बलखाये  कमर चाल  मस्तानी,

निकले  होठोंसे  हँसीं का  झरना
यौवन  पुष्पों का  उठना  गिरना
देखकर  तेरी   मदमस्त  अदाये
 गढ़  जाए  न  कोई  नई  कहानी,


dheerendra bhadauriya,,,,,

शनिवार, 10 मई 2014

आम बस तुम आम हो

आम बस तुम आम हो 

हे आम  के बृक्ष उदार  तुम, उपकार  करते  हो  सदा
भगवान्  ने  तुमको रचा है,करने  जगत  का फायदा

तुम  हो  मदन के  बाण , तुम में खूबियाँ  बे शुमार है
पथिकों   विहंगों  प्रेमियों  को, तुम्हीं  से  बस प्यार है

बौर आते  ही बसंत  में, तब  सुगंध  सब  को  मोहती
विखर उठती  छटा अनुपम जो मधुलिका सी सोभती

पत्थर  चले  डंडे   पड़े  राजा   फलों  में  विख्यात  हो
रहते  सदा  चुप  देखते ,जैसे  तुम्हे  कुछ  हुआ न हो

ठंडक   सहो , गर्मी   सहो ,  बर्षात   तो  सहते   सदा
ओले  गिरे  आँधी चले , विचलित  न  होते  तुम कदा

औषधि  गुणों  की खान  तुम  हो, पंछियों  के आस रे
शान्ति  मिलती   यात्रियों  को, सुखद  एक  प्रवास  रे

पूजनीय   उदार   तुम   हो   कल्याणकारी   ताज  हो
 तुमसे बने,जो 'आम 'खाये ,हितकारियों  का  राज  हो 

उपयोग  बाहुलता  लिये , हे आम  बस तुम  आम  हो
यह चिरातन  सत्य है , कि तुम  शान्ति के  पैगाम हो
 
dheerendra singh bhadauriya

रविवार, 27 अप्रैल 2014

अनाडी बन के आता है

 
अनाडी बन के आता है
 
 अनाडी  बन के  आता है, खिलाड़ी  बन  के  जाता है 
  लगे  जो  दाग  दामन  में, उन्हें  सब  से  छुपाता  है,

अगर  इंसान  ये  होता , कभी  का  मर  गया  होता
  फकत दो वक्त की रोटी में,ये क्या-क्या मिलाता है,

मेरा  हमर्दद  बन  करके , मेरे  ही  आँख  का  आंसू
  चुरा   करके   उन्हें   बाजार  में , ये   बेच   आता  है,

कभी  उम्मीद  बन  जाता,कभी  संगीन  बन  जाता
  मेरी   ही  जेब  पर  हर  वक्त,  ये  पहरा  लगाता  है,

न  ये  जाने  न  मैं  जानूं , न  ये  माने  न  मैं  मानूं
  वही  किस्से  यहाँ  आकर,मुझे  हर  दिन  सुनाता है,

मैं अपनी  भूख  से  डरता  नहीं,बस  नींद  से  डरता
  मेरे  सपनों  में आ करके ,मेरी  कमियां  गिनाता है,

है  इसके  शब्द  में  जादू, ये  जादू  का  असर  यारा
  मेरे   ही   हाथ   से   ये  क़त्ल , मेरा   ही  कराता  है,

कहीं  पर आम  बन जाता, कहीं  पर ख़ास हो जाता
  सड़क  पर   हर   खड़ा   बंदा , इसे  नेता  बताता  है,

विक्रम सिंह ( केशवाही )शहडोल.म.प्र.
 

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

उठती टीस एक मन में.

उठती  टीस  एक  मन में
न्योला एक किसान ने पाला,वह करता था उससे प्यार
पत्नी और  दुधमुहा  बच्चा, बकरे  बकरी का था संसार

टिक टिक कर दौड़ा फिरता,न्योला था मालिक के साथ
क्षमता भर रोज बटाता,अपने मालिक के कामो में हाथ

सच्चा साथी  सच्चा सेवक, स्वामिभक्त  था  वह प्राणी
मालिक था निश्चिन्त किन्तु,पत्नी थी इससे अनजानी

न्योले  को घर  छोड़  एक दिन,गई  कुआँ  में लेने  पानी
बच्चे  को  था  पास  सुलाया , न्योला  करता  निगरानी

एक सांप  तब घर  पर आया ,न्योले का  था शत्रु  महान
झपट  पकड़ टुकड़े  कर डाले,सेवा का  उसको था ध्यान

मुँह था सना खून से लथपथ ,आई तभी मालकिन पास
न्योला  आया  तभी सामने,उसे  दिलाने  यह  अहसास

हुई  संशकित  उसे  देखकर, फेका  सिर से घडा  तपाक
सोचा  बच्चे को  खा  डाला,अरे  लाभ क्या  इससे ख़ाक

बिन जाने  बिन सोचे  देखे ,न्योले  को  पत्थर  दे  मारा
पत्थर पड़ा  जोर से त्योही,न्योला वहीं  मर गया बेचारा

घर  में  घुसी  खेलता  बच्चा , उसे  देखकर  सहम  गई
रोती  और  पीटती  छाती , पछताती  मति  भटक  गई

अब  पछताने  से  क्या  होता, उसने ही  मारा है  उसको
बिना  विचारे  सोचे  समझे ,हत्यारा समझा  है जिसको

 कभी-कभी  ऐसे  कुछ  मौके,आ  जाते  जब  जीवन  में 
 पश्चाताप  हाथ  रह  जाता , उठती  टीस  एक  मन में


dheerendra singh bhadauriya  

रविवार, 13 अप्रैल 2014

आज चली कुछ ऐसी बातें.


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आज चली कुछ ऐसी बातें...

 

 आज चली  कुछ  ऎसी बातें, बातों पर हैं  जाएँ बातें

हँसती हुयी  सुनी हैं बातें, बहकी हुयी  सुनी हैं  बातें
बच्चो की क्या प्यारी बातें,इनकी बातें,उनकी बातें
होती हैं  कुछ अपनी बातें, दिल को छू जाती हैं बातें
आसूँ  में  कुछ डूबी बातें, क्यूँ करते हो  ज्यादा बातें
 आज  चली कुछ  ऐसी बातें, बातों पर हो जाएँ बातें 

होती बड़ी मृदुल  कुछ बातें, कर्कश भी होतीं है बातें
  प्रेम  कराती  हैं  ,ये  बातें,  बातें   बंद   कराती  बातें  
सहनी पड़ती हैं कुछ बातें,सही नहीं जातीं कुछ बातें
उचे  स्वर में  होतीं बातें,  चुपके -चुपके  होतीं  बातें


 आज  चली  कुछ ऐसी बातें, बातों  पर हो  जाएँ बातें 

नयनों में  जब होतीं  बातें, क्या समझोगे  ऎसी बातें
हर भाषा  में होतीं  बातें, कुछ सच्ची  कुछ झूठी बातें
हार की बातें जीत की बातें,गीत और संगीत की बातें
 ज्ञान और विज्ञान की बातें,हर मौसम पर करते
बातें  
 
आज चली  कुछ ऐसी  बातें, बातों  पर हो जाएँ  बातें

कभी  वीरता की  हों बातें, क्रोध  भरी भी  होतीं बातें
डींग  हाकती हैं  कुछ बातें, डरी और  सहमी सी बातें
ध्रणा दर्द पर भी हों बातें, जन्म म्रत्यु  पर होती बातें
बंद करो  भी ऐसी  बातें, अब न सुनी  जाती  ये बातें


आज  चली  कुछ ऐसी  बाते,बातों  पर हो  जाएँ बाते 
 
प्रेम और परमार्थ की बातें,धनी और निर्धन की बातें
ताकतवर  निर्बल की बातें, भूखे प्यासों  की भी बातें
सुनने जाते हैं कुछ बातें, सुनकर न सुन ते कुछ बातें
कुछ  होतीं  है ऐसी बातें, कह न कही  सकते  वे बातें


आज चली  कुछ ऐसी  बातें, बातों पर  हो जाएँ  बातें

ममता मयी हैं माँ की बातें, शिक्षा देती गुरु की बातें
अच्छी और  बुरी  कुछ बातें, है गंभीर बहुत  सी बातें
कभी-कभी भरमाती  बातें, है इतिहास  बनाती बातें
युगों-युगों  तक चलती बातें, कुछ हो
तीं हैं ऎसी बातें

आज  चली कुछ ऐसी  बातें, बातों पर  हो  जाएँ बातें 

 
किसके दम पर इतनी बातें, इस पर भी हो जायें बातें
दिल की  धड़कन  से हैं बातें, सासों पर निर्भर हैं बातें
जब तक  करती हैं ये बातें,तब तक है अपनी भी बातें

खतम नही  हुई  हैं बातें, सोच समझ कर करना बातें

  आज चली  कुछ ऐसी  बातें, बातों पर  हो  जाएँ  बातें 
 
vikram
http://vikram7.blogspot.com

शनिवार, 29 मार्च 2014

माँ, ( 200 वीं पोस्ट, )

  स्व. पं ओम व्यास 'ओम' जी की एक सुन्दर रचना.
माँ 
माँ,माँ-माँ संवेदना है,भावना है अहसास है 
    माँ,माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है, 
 


माँ, माँ रोते हुए बच्चे का  खुशनुमा पलना है,
माँ, माँ मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है,

माँ, माँ लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,
माँ, माँ पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है,

माँ, माँ आँखों का सिसकता हुआ किनारा है,
माँ,माँ गालों पर पप्पी है,ममता की धारा है,

माँ, माँ झुलसते दिलों में कोयल की बोली है,
माँ,माँ मेहँदी है,कुमकुम है, सिंदूर है,रोली है,

माँ,  माँ  कलम  है , दवात  है, स्याही  है,
माँ,माँ परमात्मा की स्वयं एक गवाही है,

माँ,  माँ  त्याग  है , तपस्या  है , सेवा  है,
माँ, माँ फूँक से ठँडा किया हुआ कलेवा है,

माँ,माँ अनुष्ठान है,साधना है ,जीवन का हवन है,
माँ, माँ जिंदगी के मोहल्ले में आत्मा का भवन है,

माँ, माँ चूडी वाले हाथों के मजबूत कंधों का नाम है,
 माँ,  माँ  काशी   है, काबा  है   और  चारों  धाम  है, 

माँ, माँ  चिंता  है, याद है, हिचकी है,
माँ, माँ बच्चे की चोट पर सिसकी है,

माँ, माँ  चुल्हा-धुँआ-रोटी  और हाथों  का छाला  है,
माँ,माँ ज़िंदगी की कड़वाहट में अमृत का प्याला है,

माँ,  माँ   पृथ्वी  है,  जगत   है,  धूरी   है,
माँ बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है,

तो माँ की ये कथा अनादि है,ये अध्याय नही है
 ....…और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है,

तो माँ का महत्व दुनिया में कम हो नहीं सकता,
और  माँ जैसा  दुनिया  में कुछ  हो नहीं  सकता,

 और  माँ  जैसा  दुनिया  में  कुछ  हो  नहीं  सकता,
 तो मैं  कला की ये पंक्तियाँ माँ  के नाम  करता हूँ,
 और दुनिया की सभी माताओं को प्रणाम करता हूँ,

 
एक उत्कृष्ट रचना पढ़वाने के लिए आभार...



गुरुवार, 20 मार्च 2014

प्यार में दर्द है.


प्यार में दर्द है,
 
प्यार में दर्द है ,दर्द से प्यार है,न कहीं जीत है न कहीं हार है 

 
 वो सनम  जब यहाँ  बेवफा हो गया 
 टुकड़े-टुकड़े जिगर के मेरे कर गया,
 हँस  के मैंने  उसे बस  यही था कहा 
   तू  मेरा  प्यार  है, वो  तेरा  प्यार है ! 

 
प्यार में दर्द है ,दर्द से प्यार है,न कहीं जीत है न कहीं हार है!

 
 सबके लब तर यहाँ जाम खाली नही
 नजरें साकी की मुझपे इनायत नहीं,

फांसले  जब  बढे  मैंने  इतना  कहा
  क्या  यही जीत  है क्या यही हार है !

 
प्यार में दर्द है ,दर्द से प्यार है,न कहीं जीत है न कहीं हार है!

 
प्यार  को रूप  रंगत से मतलब नही
 प्यार को सोने चाँदी की दरकत नही,
 उनके  सौदाईपन  पे  किसी  ने कहा 

     इस्क की जीत  है, हुश्न की  हार  है !   
 
प्यार में दर्द है ,दर्द से प्यार है,न कहीं जीत है न कहीं हार है!

 
 प्यार के नाम पर,तुम ये क्या कर गये 
  नाम  लेके   वफा  का  जफा  कर  गये, 
 उनके  दिल से मेरे दिल ने इतना कहा 
  न  तेरी   जीत   है , न   मेरी   हार  है ! 

 
प्यार में दर्द है ,दर्द से प्यार है,न कहीं जीत है न कहीं हार है!


 dheerendra singh bhadauriya

रविवार, 16 मार्च 2014

रंग रंगीली होली आई.


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रंग रंगीली होली आई..

रंग - रंगीली  होली  आई   मस्तानों   के   दिल  में  छाई
जब माह  फागुन  का आता  हर घर में  खुशियाली लाता
नया काम  व्यवसाय बढाता  सबके मन में जोश जगाता
  गली - गली  में   धूम  मचाई  रंग   रंगीली   होली   आई, 


        लाल  पलास  खिले  कुंजन  में  भंवरें घूम रहे  मधुबन में        
 पायल  बाजे   जब  पैरों  में   हूक  उठे  गोरी  के  मन  में 
  फागुन  ने   ये  आग   लगाई   रंग   रंगीली   होली  आई, 


आमों  में  जब   बौरें   छाई    कोयल  गीत  सुनाने  आई
उपवन  महक उठा  खुशबू से  भौरों  ने  तब तान  सुनाई
  बहने   लगी   पवन   पुरवाई    रंग   रंगीली  होली  आई, 


 कोई  रंग   कोई   पिचकारी  साली  को  है  आफत  भारी 
      कोई  पकड़े  कोई  घसीटे  रंग में   लथपथ  भौजी  प्यारी      
  होती  आपस  में  गले  मिलाई   रंग  रंगीली  होली  आई, 


 कोई  भंग  कोई  दारू  सोटें  बीच  सड़क  में  जीजा  लोटे 
    गाना  बजता  मुन्नी  वाला  करे  निछावर  सौ  की  नोटें    
"धीर" ने  महफ़िल  खूब  जमाई  रंग  रंगीली  होली  आई,

 dheerendra"dheer"

बुधवार, 12 मार्च 2014

फिर से होली आई.


holi animated scraps, graphics


फिर से  होली आई

 रस  बरसाते  रंगों के  संग, फिर  से  आई  होली ,
 फागुन का त्यौहार निराला भर लो अपनी झोली !

 मौज मनाए  मिल-जुल  कर  आओ  खेल रचाए ,
 लें  गुलाल  लें रंग  फाग  का  सबसे  प्रेम  बढाए !

 चारों  ओर  लगा  है  मेला  मौसम  बना  रंसीला ,
 स्नेह  रंग की  ऋतू आई कर लो  तनमन  गीला !


 पिचकारी  का  रंग  उड़ाएं  हँसकर  करे  ठिठोली ,
 ऊँची नीच  का  भेद  भुलाऐ  बन जाऐ  हमजोली !


  हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, हम सब  भाई- भाई , 
 आपस  के  मतभेद  भुला दो  फिर से  होली आई !

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया



गुरुवार, 6 मार्च 2014

पुरानी होली.

 पुरानी होली

 कम  पैसा   पर  रुतवा  था 
 कम ज्यादा कुछ रकबा था 

मेहनत  की  हम  खाते  थे
इज्जत   से   सो   जाते  थे
 
पूनम    की   वो   रातें   थी
सच्ची  झूंठी  कुछ बातें थी
 
जब होली की रुत आती थी
तब भंग  पिलाई  जाती थी
 
हम  रंग   खेलने   जाते  थे
रंग  में   लथपथ   आते  थे

होरियारो  की  टोली  आती
   भगदड़  सी तब मच  जाती   
     
होली  में  फागें  जमती  थी
होंठों पर  चिलमें रमती थी
 
नुक्कड़  और  चौपालों  पर
कक्का  जी   के  गालों  पर
 
कैसा मंजर  वो  लगता था
रंग   बराबर    जमता   था
 
अब  सब  कुछ  बीराना  है
होली अब बस अफ़साना है

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

बदले जो न ढंग.( दोहे )

बदले जो न ढंग.
 
हाथ गुलाल लिए खड़े,मोहन  बहुत  उदास ,
राधा  पहुँची  डेट पर, और  किसी  के साथ !

राधा के  मन और है, मोहन  के  मन  और ,
इसके मन  भी चोर है, उसके मन  भी चोर !

होली दिवाली  भाय न, भाये अब  न बसंत ,
मोहन  के  मन अब  बसे, बैलेटाइन  सन्त !

पहले  चाट  पसंद  थी ,अब  पसंद  है  चैट ,
मनमोहन   की  बाँसुरी , बना  है  इंटरनेट !

राधा, मीरा, रुकमणी, सब  जाने  यह बात ,
इस मोहन  का वायदा, नहीं किसी के साथ !

देश ,वेश , भाषा  गई , बचा  है  केवल  रंग ,
यूँ  ही  गुम  हो  जावगे. बदले  जो  ना  ढंग !


धीरेन्द्र सिंह भदौरिया,
 

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

फागुन की शाम.

फागुन की शाम

पोखर में 
डूब रही 
  फागुन की शाम ! 
झुक आया 
धरती तक 
 नीला आकाश, 
देख - देख 
हो बैठी 
 पत्तियाँ उदास ! 
सूरज ने  
घोड़ों की  
  खोल दी लगाम !  
  सतरंगी किरणें    
अब - 
   पीपल से झांक,    
भाग - भाग   
जाती है   
   सूनापन आंक !    
सुधियों में   
बैठ गया   
भूला सा नाम    
पोखर में   
डूब रही   
   फागुन की शाम !