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गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

दीप जलाये .

 दीप जलायें
खेतों में  दीप जलाये  कृषकों  ने  नई फसल के !
  दरिद्रता का घना अन्धेरा मिटा इसी के बल से !! 

चारो ओर धरा है जगमग ,आज सुहानी लगती !
 खुशहाली  के गीत गूँजते, नई आशाऐ  जगती !! 

हरवाहे  किसान महिलाएं, श्रम की माल पिरोती !
 दीपपर्व पर  कर न्योछावर,आज खुशी  के मोती !!

लक्ष्मी-सुत, लक्ष्मी का  वंदन  दीपावली  में  करता !
  जला  जला  माटी  के  दीपक, आज अन्धेरा  हरता !!

 
घर आनाज तो सदा दिवाली,संभव किसान है करता !
 लक्ष्मी-सुत  इसलिए  वही  है,खेतों में  स्वर्ण बरसता !!
 
धान,ज्वार,बाजरा,उड़द, मक्का की जब फासले आती !
 करे  किसान  फसल का  स्वागत, वे उसके गुण गाती !!

जितना उजला प्रकाश पूनम का उतनी काल निशा  है !
अंतर मिटा आज  ही  केवल ,यद्दपि विपरीत  दिशा है !!

श्रम  के दीप जलाकर लेकिन किसान प्रकाश है लाता !
 उसकी मेहनत प्रबल साधना से ही सारा जग है खाता !! 
dheerendra singh bhadauriya