पोखर में
डूब रही
फागुन की शाम !
झुक आया
धरती तक
नीला आकाश,
देख - देख
हो बैठी
पत्तियाँ उदास !
सूरज ने
घोड़ों की
खोल दी लगाम !
सतरंगी किरणें
अब -
पीपल से झांक,
भाग - भाग
जाती है
सूनापन आंक !
सुधियों में
बैठ गया
भूला सा नाम
पोखर में
डूब रही
फागुन की शाम !