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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

फागुन की शाम.

फागुन की शाम

पोखर में 
डूब रही 
  फागुन की शाम ! 
झुक आया 
धरती तक 
 नीला आकाश, 
देख - देख 
हो बैठी 
 पत्तियाँ उदास ! 
सूरज ने  
घोड़ों की  
  खोल दी लगाम !  
  सतरंगी किरणें    
अब - 
   पीपल से झांक,    
भाग - भाग   
जाती है   
   सूनापन आंक !    
सुधियों में   
बैठ गया   
भूला सा नाम    
पोखर में   
डूब रही   
   फागुन की शाम !