पुरानी होली
कम पैसा पर रुतवा था
कम ज्यादा कुछ रकबा था
कम ज्यादा कुछ रकबा था
मेहनत की हम खाते थे
इज्जत से सो जाते थे
इज्जत से सो जाते थे
पूनम की वो रातें थी
सच्ची झूंठी कुछ बातें थी
जब होली की रुत आती थी
तब भंग पिलाई जाती थी
हम रंग खेलने जाते थे
रंग में लथपथ आते थे
होरियारो की टोली आती
भगदड़ सी तब मच जाती
भगदड़ सी तब मच जाती
होली में फागें जमती थी
होंठों पर चिलमें रमती थी
होंठों पर चिलमें रमती थी
नुक्कड़ और चौपालों पर
कक्का जी के गालों पर
कैसा मंजर वो लगता था
रंग बराबर जमता था
अब सब कुछ बीराना है
होली अब बस अफ़साना है
धीरेन्द्र सिंह भदौरिया
