दीप जलायें
खेतों में दीप जलाये कृषकों ने नई फसल के !
दरिद्रता का घना अन्धेरा मिटा इसी के बल से !!
खेतों में दीप जलाये कृषकों ने नई फसल के !
दरिद्रता का घना अन्धेरा मिटा इसी के बल से !!
चारो ओर धरा है जगमग ,आज सुहानी लगती !
खुशहाली के गीत गूँजते, नई आशाऐ जगती !!
हरवाहे किसान महिलाएं, श्रम की माल पिरोती !
दीपपर्व पर कर न्योछावर,आज खुशी के मोती !!
लक्ष्मी-सुत, लक्ष्मी का वंदन दीपावली में करता !
जला जला माटी के दीपक, आज अन्धेरा हरता !!
घर आनाज तो सदा दिवाली,संभव किसान है करता !
लक्ष्मी-सुत इसलिए वही है,खेतों में स्वर्ण बरसता !!
लक्ष्मी-सुत इसलिए वही है,खेतों में स्वर्ण बरसता !!
धान,ज्वार,बाजरा,उड़द, मक्का की जब फासले आती !
करे किसान फसल का स्वागत, वे उसके गुण गाती !!
करे किसान फसल का स्वागत, वे उसके गुण गाती !!
जितना उजला प्रकाश पूनम का उतनी काल निशा है !
अंतर मिटा आज ही केवल ,यद्दपि विपरीत दिशा है !!
श्रम के दीप जलाकर लेकिन किसान प्रकाश है लाता !
उसकी मेहनत प्रबल साधना से ही सारा जग है खाता !!
dheerendra singh bhadauriya
