शनिवार, 28 अप्रैल 2012

आगे कोई मोड नही ....



आगे कोई मोड नही

मुझे जिन्दगी के
रथ पर बैठा दो,
और उसके अश्वो को
पवन वेग से दौडा दो,
उस काल खंड तक
जहाँ प्यार में खोये
सब पलों का दर्द
बेमानी हो जाता है!
इक नई शुरुआत के
आश्वाशन पर
या
इस रथ को
ले चलो अतीत की ओर,
उस बिंदु तक
जहां कुछ गलत मोड मुड आये थे,
एक ऐसी राह पर
जिसके आगे
फिर कोई मोड नही है!
या फिर
घुमते इस काल चक्र से
कहो तो चुरा लूँ वह पल
जब हम एक साथ जिए थे,
सहेज रखूं उसे ही मन मस्तिष्क में,
संबल बन जाए वही
मेरे एकाकीपन का.....

DHEERENDRA,"dheer''

रविवार, 22 अप्रैल 2012

गजल.....

गजल

अल्मारी में सजाकर जो दीवान रखा है,
उसके हर सफे पर उनका ही नाम लिखा है!

क्यों छा गया नशा इस कदर अभी से,
पी नही, बस लबो पर जाम रखा है!

मेरे यादों के हर-गजल और रुबाई में,
उनको मोहब्बत से भरा पैगाम लिखा है!

वे बार बार बंद कर लेते है अब आँखे,
सूना है सपने में उन्हें भगवान दिखा है!

उनके खत का मजमून तो देखो यारो,
खुद को साकी और हमे खैय्याम लिखा है!

खबर है हर चीज अब बिकने लगी है,
पूछना दिल का वहाँ क्या दाम रखा है!

"धीर" के दिल को खिलौना न समझना यारों,
दिल को जज्ब कर उसमे तूफ़ान समा रखा है!

DHEERENDRA,"dheer"

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

कवि,...





कवि

क्या अपनी, परिभाषा लिख दूँ
क्या अपनी,अभिलाषा लिख दूँ
शस्त्र कलम को, जब भी कर दूँ
तख्तो त्ताज ,बदल के रख दूँ

केंद्र
बिंदु, मष्तिक है मेरा
नये विषय का , लगता फेरा
लिखता जो , मन मेरा करता

मेरी कलम से , कायर डरता

क्रोधित होकर कभी न लिखता

सदा सहज बन कर ही रहता
विरह
वेदना ,पर भी लिखता
प्यार भरी भी , रचना करता

कभी
नयन को,रक्तिम करता
कभी मौन हूँ, सब को करता
कभी वीरता के , गुण गाता
दुर्गुण को भी , दूर भगाता

मन
मेरा है, उड़ता रहता
अहंकार से , हरदम लड़ता
गुनी जनीं का ,आदर करता
सारा जग,कवि मुझको कहता

DHEERENDRA,"dheer"

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

आँसुओं की कीमत,....

आँसुओं की कीमत

इन आसुओं कीमत तुम न, समझ सकोगी
मुझसे यूं दूर रहकर,तुम भी न जी सकोगी

तडपते थे प्यार में हम इक दूसरे के ऐसे
वो दिन भुला के यारा, जाओगे बोलो कैसे

वादे किये थे हमने,होगे जुदा नहीं हम
कैसे सहोगी जाना, मुझसे जुदाई का गम

मुझको यूँ करके तन्हा तुम जा कहाँ रही हो
जानेमन सोच लेना, तुम प्यार खो रही हो

बदनाम रास्तो में भला क्यां तुम्हे मिलेगा
मंजिल मिलेगी फिर भी,यह प्यार न मिलेगा

मुझे यूं रुला के तुमको कैसे,सुकूँ मिलेगा
तुझे हर खुशी में अपनें,मेरा दर्द ही मिलेगा

तेरी याद तो हमेशा मेरे साथ ही रहेगी
गुमनाम ''धीर'' होगा,ये पीर तुम सहोगी
नोट -नीचे लिखी रचना की सर्जरी कर आज ही इसे लिखा है दोनों में कौन सी रचना अच्छी लगी...
DHEERENDRA"dheer"
आँसुओं की कीमत
मेरी आँसुओं की कीमत तुम न चुका सकोगी,
मेरे दिल से दूर रहकर तुम भी जी न सकोगी!

तडपते थे हम एक दिन अपने प्यार में कभी,
मुझको भुला के तुम वह दिन न भुला सकोगी!

खाई थी कसमे निभाने की न होगें जुदा कभी,
मुझको जुदा करके तुम जुदाई न सह सकोगी!

मुझको छोड़ कर यूँ तन्हा तुम चल दिए कहाँ,
मेरी न सही तो दुसरे के भी तुम न हो सकोगी!

उन रास्तों पर न जाओ जो कभी बदनाम रहें है,
तुम्हे मंजिल तो मिलेगी पर मुझे न मिल सकोगी!

तुमने बहुत तडपाया मुझको संकू तुमको न मिलेगा,
जो जख्म दिया है मुझको उन्हें तुम भर न सकोगी!

अपने ही वीरानो में हम हमेंशा के लिए खो जायेगें,
चाहे जितना करो तलाश तुम "धीर" को पा न सकोगी!

DHEERENDRA"dheer"

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

यदि मै तुमसे कहूँ.....


यदि मै तुमसे कहूँ,
कि मेरे मन पर
तुम इस तरह छा गई हो,
कि मै ओत प्रोत हो गया हूँ
तुम्हारे व्यक्तित्व के जादू में
जो व्याप्त है -
प्रकृति की मनमोहक छटाओं में,
उषा की शीतलता में
शून्य की शान्ति में
भक्तों के आल्हादित मन में
कलियों की अल्हडता मे
ऋषियों की तपश्चर्या में
तो क्या तुम मेरा विश्वास करोगी-?
मुझे नहीं लगता ऐसा,
शायद मेरे शब्द में वह शक्तिं नही है,
जो सच बातों में
सच्चाई का बोध करा दे
मेरे मन की निश्छल वाणी
इतनी प्रखर नही है
जो अन्तस् का भाव बता दे,
मेरे पास तुम्हारी यादे ही यादें है,
हर क्षण साथ रहने वाली
इन यादों की कसम उठा कर
यदि मै तुमसे कहूँ
कि यह सचमुच ही सच है,
तुम
प्राणों को भी प्राण बाटनेवाली तुम
सृष्टि रचयिता की रचना को रचनेवाली तुम,
तुम्ही तो हो मेरा सर्वस्व
उत्कर्ष मेरा निष्कर्ष मेरा
क्या मुझे स्वयं में रचा सकोगी-?
मेरे साथ अपने 'स्व' को
विलीन कर मुझमें
और मुझे अपने में
समाहित कर सकोगी-?
एकाकार बने और हो जाएँ अभिन्न
एक नई रचना का हो अभ्युदय
शेष रहे न चिन्ह मेरे और तुम्हारे
सचमुच क्या तुम दोगी साथ
यदि मैं तुमसे कहूँ-?

DHEERENDRA"dheer"


सोमवार, 2 अप्रैल 2012

मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

मै तेरा घर बसाने आई हूँ....

चंद कलियाँ निशांत की चुनकर,तेरा आँगन सजाने आई हूँ,
धुल मैके की झाड-फूक के सब, मै तेरा घर बसाने आई हूँ!

अपने मैके में लाडली थी मै,जाने ससुराल जा के क्या होगा.
तुम मुझे प्यार से संभालोगे, अपना जीवन हरा - भरा होगा!

मेरे सपनों में फूल खिलते हैं उनमे खुशबू तुम्हारी आती है,
दिन निकलता है याद करके तुम्हें रात सोचों में गुजर जाती है!

घर गृहस्थी मुझे नही मालूम सास-नन्दों से सीख लूंगी मैं,
प्यार से गलतियां बताएंगे अपनी गलती सुधार लूंगी मैं!

अपने बारे में क्या बताऊं तुम्हे कोरा कागज हूं कोरा पानी हूं,
हौसले आसमान छूते है थोड़ी पागल हूं थोड़ी ज्ञानी हूं!

औरतों की भी जिन्दगी क्या हैं व्रत बदलती हुई कहानी हैं,
आज बेटी हैं कल बहू फिर माँ परसों बच्चे कहेंगें नानी हैं!

मुझ को पूरा भरोसा है तुम पर तुम मेरा एतबार कर लेना,
तेज रफ्तार जिन्दगी हैं-मगर रुक के थोड़ा-सा प्यार कर लेना!


DHEERENDRA,"dheer"