शुक्रवार, 1 जून 2012

अकेलापन,,,,,


अकेलापन,

कितना मधुर सुहाना लगता है,

ये अकेलापन

कोलाहल से दूर

मन भागता सा प्रतीत होता है,

असख्य महल

बनते बिगड़ते और धरासायी होते है,

न रिश्तों खिचाव

और न कोई भर्मित आस्था

इक अलौकिक बंधनों से मुक्त

आजाद पंछी सा,विचरता हुआ मन

कितना साफ सुथरा लगता है,

ये अकेलापन,

इस शहर से दूर

कहीं निर्जन वन में,

ज़रा सी धरती की कंपन से

पत्तों की सरसराहट

मुझे झकझोर देती,

बस खोखला हो जाता है!

ये अकेलापन,,,,,,

dheerendra,"dheer"

57 टिप्‍पणियां:

  1. ...मगर यह अकेलापन हमें अपने से मिलाता है,यही बहुत बड़ी बात है !

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  2. नमस्कार धीरेन्द्र जी कैसे है आप
    आज कई दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ बेहतरीन और अच्छी रचना...अंतिम पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगीं... शानदार प्रस्तुति

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  3. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है !!

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  4. बहुत ही सुन्दर कविता, एकान्त चिन्तन के रत्न निकाल लाता है।

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  5. अकेलापन भी ज़रूरी है .... बहुत कुछ जानने के लिए

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  6. आजाद पंछी सा,विचरता हुआ मन

    कितना साफ सुथरा लगता है,
    sach kaha dheerendra ji !
    yatharth parak rachna !

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  7. ये अकेलापन ही तो अपना होता है सिर्फ अपना.... ..धीरेन्द्र जी बहुत सुन्दर भाव..

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  8. न रिश्तों खिचाव

    और न कोई भर्मित आस्था
    न रिश्तों खिचाव
    और न कोई भर्मित आस्था

    भाई साहब अच्छा बिम्ब है ,ऐसे ही टूटती है विचार श्रृंखला पत्तों की सरसराहट से क्योंकि अन्दर ही से सब कुछ रीता रीता है .बेहतर हो आप 'भ्रमित' कर लें भर्मित को ,और 'रिश्तों खिंचाव' कुछ जम नहीं रहा (रिश्तों से रिसन खिंचाव की या 'खिंचाव रिश्तों का 'ठीक लगे कवि कर्म के अनुरूप तो कर लें हमारा तो इलाका है नहीं .लेकिन क्या करें अब आप से मोहब्बत हो गई तो कवि कर्म भी आपसे सीखेंगें .कृपया यहाँ भी पधारें -
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

    उतनी ही खतरनाक होती हैं इलेक्त्रोनिक सिगरेटें

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  9. अकेलेपन को भोगने से पहले ही उसका महत्व समझना अच्छा!

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  10. अकेलापन बहुत कुछ दे जाता है, अकेला होकर भी अपना होता है... सुन्दर रचना... आभार

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  11. यह अकेलापन ही रिश्तों को समझ पाता है .........

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  12. अकेलापन भी बहुत जरूरी होता है.....खुद से बात करने के लि‍ए। सुंदर रचना..

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  13. सुंदर भाव धीरेन्द्र जी....

    तन्हाई में ही तो हम खुद को पाते हैं......

    सादर.

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  14. यान्हाई को एक नयी ऊंचाई प्रदान की है आपने!!

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  15. अलग ही बिंबों में सजी सुंदर रचना...
    सादर।

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  16. बेहद खूबसूरत ,अपने से भाव

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  17. अकेलेपन मे ही खुद को पाया जाता है।

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  18. आज एकदम अलग सा सुर है । खुद को खोजने का अच्छा प्रयास होता है ये अकेलापन ।

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  19. इक अलौकिक बंधनों से मुक्त
    आजाद पंछी सा,विचरता हुआ मन
    कितना साफ सुथरा लगता है,
    ये अकेलापन

    यकीनन अच्छा लगता है पर कुछ समय बाद फिर कोलाहल की दरकार होने लगती है

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  20. कभी कभी अकेलापन भी अच्छा लगता है ।
    लेकिन थोड़े समय के लिए ।

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  21. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  22. आजाद पंछी सा,विचरता हुआ मन

    कितना साफ सुथरा लगता है,

    ये अकेलापन,

    .....सिर्फ़ कुछ समय के लिये और फ़िर मन बेचैन होने लगता है उसी कोलाहल को...सुन्दर प्रस्तुति..

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  23. पत्तों की सरसराहट
    मुझे झकझोर देती,
    बस खोखला हो जाता है!
    ये अकेलापन,,,,,,
    कोलाहल से दूर जीवन का रस तो है धीर जी........ एकान्तिक सुख को अभिव्यक्त करती आपकी यह अंजलि भी मन मोह गयी. आभार !

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  24. कभी कभी मन अकेलापन चाहता है और अगर वो ज्यादा हो जाये तो मन मरने भी लगता है बहुत अच्छी रचना

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  25. ये अकेलापन .......
    ओह मुझे बहुत पसंद है
    बढ़िया रचना ......

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  26. इतनी अच्छी रचना तन्हाई में लिखी है लगता है
    लगातार एक से बढ़ का एक रचना की प्रस्तुति
    आदरणीय धीरेन्द्र जी बहुत बहुत बधाई
    किताबें कुछ कहना चाहती है,सुनहरा कल,
    ऐ हवा महक ले आ..उसके बाद अकेलापन
    वाह...

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  27. अकेलेपन से निकलते हैं कुछ स्वर्णिम पल!
    सादर!

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  28. बेहद खूबसूरत ,अपने से भाव,बहुत बढ़िया प्रस्तुति!आभार .....

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  29. बेहद सुन्दर व भावमयी प्रस्तुति

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  30. इस शहर से दूर

    कहीं निर्जन वन में,

    ज़रा सी धरती की कंपन से

    पत्तों की सरसराहट

    मुझे झकझोर देती,
    khubsurat aihasas, with silent speech.

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  31. अकेलेपन की अपनी ताज़गी होती है ....एक अनोखा ज़ाइका .....जिसने इसे चख लिया ....उसका आदि हो जाता है ....!!!!

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  32. बहुत खूबसूरत लिखा है आपने बहुत ही भावपूर्ण पोस्ट.

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  33. आपकी रचना पढकर आनंदित होने का पल मैं इस पल जी रहा हूँ , मुबारक !

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  34. दो रूप ..कभी अच्छा कभी बुरा .....

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  35. समुन्द्र के किनारे - इस अकेलेपन की अनुभूति अजब सी होती है ! चित्र और कविता मेल खाती है ! सुन्दर

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  36. अकेलेपन के अहसास को साकार करती सुंदर कविता।

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  37. ये अकेलापन,,,,,,

    केवल अपना साथ तभी होता है.....
    तभी हम खुद को महसूस कर पाते हैं !

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  38. अकेलापन कभी काट खाने को दौड़ता है तो कभी बहुत ही सुकून पहुंचाता है।

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  39. अकेलापन अगर क्षण भर के लिए सुन्दर है तो असंख्य क्षणों के लिए भयावह भी है.

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  40. कुछ पल के लिए ही अच्छा लगता है ये अकेलापन ... फिर उससे दूर हूने का मन करता है ...

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  41. लम्बे भागदौड के बाद अकेलपन के रूबरू होने का आनंद ही कुछ और है.जिसे शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता है...बहुत खूब सर !

    "आजाद पंछी सा,विचरता हुआ मन

    कितना साफ सुथरा लगता है,"

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  42. tanhai na hoti to apno kee keemat ka bhee pata nahi chalta...baise jindagi ko kabhi bheed to kabhi tanhai raas aati hai..sunder rachna..sadar badhayee aaur amantran ke sath

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  43. वाकई अकेलापन ऐसा ही होता है। रचना पसंद आई।

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  44. अकेलेपन में हम और हमारा संसार होता है, लेकिन एक ज़रा सी सरसराहट और अकेलेपन की दुनिया विलीन. अजब है ये अकेलापन, कभी खामोशी तो कभी समस्त संसार की खुशियाँ समेटे होता है अकेलापन. बहुत सुन्दर रचना, बधाई.

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  45. बहुत खूबसूरत अहसास... सुंदर कविता !

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  46. यह रचना दिल छू गयी धीर भाई ....

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  47. अकेलापन ही हमारी पहचान हमसे करवाता है..वरना लोगों की भीड़ में तो हम खुद से मिल भी नहीं पाते.... बहुत बढ़िया!

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  48. जो मजा अलेकेपन में है वो कंहीं भी नहीं .......... आपकी पोस्ट मैं हिन्दी ब्लॉग परिवार में डाल रहा हूँ....... ये अभी शुरू किया गया है ...इससे जुड़े ओर ब्लॉगर की रचनाओ के लिंक आसानी से पढ़े ओर उनपर पहुँचे

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  49. ख़ुद को खोजने के लिए .....अकेलेपन का साथ जरुरी है
    अकेलेपन के अहसास को साकार करती सुंदर कविता।

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  50. http://www.fnur.bu.edu.eg/
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/422-2013-12-10-10-18-01
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/421-2013-12-10-09-48-39
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/419-2013-12-09-07-21-12
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/420-2013-12-10-09-48-38
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/417-2013
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/418-2013-12-09-07-17-28
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/415-2013-12-03-08-09-23
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/416-2013-12-03-08-25-21
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/413-2013-11-21-07-50-21
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/414-2013-11-25-09-38-30
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/411-2013-11-20-08-11-53
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/412-2014
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/409-2013-2014
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/410-2013-11-13-17-25-28
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/407-2013-11-09-08-51-15
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/408-2013-11-13-11-55-53
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/405-2013-11-09-08-42-05
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/406-2013-11-09-08-46-10
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/403-2013-11-09-08-25-45
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/404-2013-11-09-08-28-15
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/400-2013-11-09-07-50-13
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/401-2013-11-09-08-03-31
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/398-2013-11-09-07-29-40
    www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/399-2013-11-09-07-43-49
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/397-eugen-ionesco
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/402-2014-2013
    http://www.fnur.bu.edu.eg/fnur/index.php/main-news/item/395-2013-11-02-09-07-04

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