सोमवार, 28 मई 2012

ऐ हवा महक ले आ...


हवा महक ले आ...

हवा जा उनके जिस्म की महक ले ,
उसे छूकर दिल के पंछी की चहक ले !

कानों में जो शहद सी घोलती थी कभी,
उनके हाथों की चूडियों की खनक ले !

मेरी नजरें हो रही धुंधली साफ़ तस्वीर बना,
मेरी नजरों से उनके चेहरे की चमक ले !

दिल का शोला जख्मो की आग ठंडी है,
उनके गर्म आहों की तू दहक ले !

धीर की तडप को कर दे और ज्यादा"जानमेरी"
उसकी बेकरारी तड़प की वो कसक ले !


dheerendra,"dheer"

गुरुवार, 24 मई 2012

सुनहरा कल,,,,,


सुनहरा कल,

सड़क तट पर
लिखे हुए अनगिनत नारे
हम एक अरसे से
पढ़ रहे है,
उनमे से एक
'हम सुनहरे कल
की ओर बढ़ रहे है'!
हमने नारी की पीड़ा को
बहुत नजदीक से
मौन रह कर देखा है,
तंदूर में रोटी की जगह
मानव ने एक अबला को
किस प्रकार सेंका है!
नारी के यौन शोषण से
पापों का घडा
ये नर पिशाच भर रहें है,
फिर भी हम अविरल
सुनहरे कल की बात कर रहे है!
औषधालय में रोज
नूतन अग्निदग्धा लाई जाती है,
दहेज न मिलने पर,
बेचारी जबरन जलाई जाती है!
जलती हुई अबला की
चीखें हमे सुनाई नही देती,
लुटती हुई नारी की अस्मत
हमे दिखाई नही देती!
सब कुछ देखते हुए भी,
हम पूरी तरह मौन है,
हम अनभिज्ञ है कि
इस सुनहरे कल का
निर्माता कौन है-?,,,,,

dheerendra,"dheer":

रविवार, 20 मई 2012

किताबें,कुछ कहना चाहती है,....


किताबें,कुछ कहना चाहती है,....

किताबे,कुछ कहना चाहती है,
तुम्हारे पास रहना चाहतीं है,


किताबें करती है बातें, बीते जमानों की,
दुनिया कि इंसानों की!

आज की, कल की,एक एक पल की,
खुशियों की, गमो की,फूलों और बमों की,

जीत की, हार की, प्यार कि ,मार की,
क्या तुम नहीं सुनोगे,इन किताबो की बाते-?

किताबें कुछ कहना चाहती है,
तुम्हारे पास रहना चाहती है!

किताबों में चिडियाँ चह्चहाती है,
किताबों में खेतियाँ लहलहाती है!

किताबों में,झरने गुनगुनाते है,
परियों के किस्से सुनाते है!

किताबों में राकेट का राज है,
किताबों में साइंस की आवाज है!

किताबों का कितना बड़ा संसार है
किताबो में ज्ञान का भण्डार है,

क्या तुम इस संसार में नही आना चाहोगे?

किताबे, कुछ कहना चाहती है,
तुम्हारे पास रहना चाहतीं है!



नोट , ये मेरी लिखी रचना नही है मेरी पुरानी डायरी में लिखी थी मुझे अच्छी लगी तो ,
आप लोगों के लिये पेश कर रहा हूँ
शायद आपको पसंद आये ,,,,,

संतोष त्रिवेदी जी,द्वारा जानकारी मिली कि ये रचना
"सफ़दर हाश्मी जी "कि है ,
संतोष जी ,,,,,,बहुत२ आभार,रचनाकार का नाम बताने के लिये ,,,,,,

मंगलवार, 15 मई 2012

बेटी,,,,,

बेटी

जब होता है जन्म किसी के , आँगन में बेटी का,
सदा लाडली होती है वह, प्यारी माँ की गोदी का!

समय गुजरता ज्यों-ज्यों , लता सी है वह बढती,
माँ बाप का पाकर प्यार ,फूलों सी है वह खिलती!

हँस-हँसकर तुतली बोली में, वह खुश सबको रखती है,
फिर भी न जाने पिता के मन, चिंता सी क्यों रहती है !

उसको बढते देख पिता का , दिल दुःखों से भर जाता.
लाऊं कहाँ से दहेज सोचकर,पिताका मन है घबराता!

सारी दुनिया कहती है आज, कि भेद नही बेटा- बेटी में,
यही सोच कर लुटा दिया ,पिता ने जो धन था गठरी में!

पढ़ा - लिखा कर योग्य बनाया , बेटी को बेटा जैसा,
विदुषी बनकर हुई सुगन्धित,फूलों की खुशबू जैसा!

किस देव पर इसे चढाकर, मै मन की शांती पाऊं,
द्वार-द्वार पर घूम घूम कर,थक गया मै कहाँ जाऊं!

अपना सा मुँह लेकर वो,घर को लौट आता है
पुत्री को देखकर ,मन ही मन आँसू बहाता है

कन्या का वर कैसा हो , यही वो सोचता रहता है,
आती है आवाज उधर से,दहेज भी देना पडता है!

किसके आगे हाथ पसारे , किसको सुनाये ये दुखड़ा,
बिना दहेज के मीत न मिले, बेटी है दिल का टुकड़ा!

हाय विधाता ये तूने कैसा, खेल अजीब दिखाया,
दहेज में बिक रही बेटियाँ , और ये मानव काया!

आज दहेज का रोग भयंकर , घर-घर कैसे दौड रहा,
कितने पिता बेटी की खातिर, मरने मजबूर होरहा!

आज हम मजबूर बाप है, बेटी की चिंता क्यों न होगी,
कल तुम जब बाप बनोगे, तुम्हारे घर जब बेटी होगी!

dheerendra,"dheer"

शुक्रवार, 11 मई 2012

आज मुझे गाने दो,...

आज मुझे गाने दो,

हृदय की पीड़ा को, प्रेम रस वीणा को,
प्रकट हो जाने दो, आज मुझे गाने दो!

नयनों के बादर से, भावों के सागर से,
बरस अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

प्रीतम के प्रीत को, मेरे हर गीत को,
एक हो जाने दो, आज मुझे गाने दो!

जग के कुरीत को, बंधन की रीत को,
टूट अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

सुरभित पवन को, पल्लिवत चमन को,
गीत गुनगुनाने दो ,आज मुझे गाने दो!

चाँद और चकोर को, वर्षा और मोर को,
मिल अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

झील के किनारों से , मस्त नजारों से,
स्वर को लहराने दो, आज मुझे गाने दो!

बसंत सुगंत को, पुष्प और मकरंद को,
बिखर अब जाने दो, आज मुझे गाने दो!

DHEERENDRA,"dheer"

सोमवार, 7 मई 2012

कभी कभी.....


कभी कभी

देखी है उनकी आँखें, अपलक कभी-कभी,
सपने भी देखे हमने, दिन में कभी-कभी!

किस सोचमें डूबी, किस बात का है गम,
चेहरा जो उनका देखा, मैंने कभी - कभी!

गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी!

अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!

DHEERENDRA,"dheer"

बुधवार, 2 मई 2012

ऐसे रात गुजारी हमने.....


ऐसे रात गुजारी हमने

रातों को करवट बदल-बदल के
घूम-घूम के टहल-टहल के,
देखी राह तुम्हारी हमने
ऐसी रात गुजारी हमने

सुंदर-सुंदर प्यारी-प्यारी
कानों में आवाज तुम्हारी
कितनी बार उतारी हमने
ऐसे रात गुजारी हमने!

दिल में अपने बना रखी है
इन आँखों में सजा रखी है
इक तस्वीर तुम्हारी हमने
ऐसे रात गुजारी हमने!

कुछ तारे कुछ खुशबू चुनकर
मीठे-मीठे सपने बुनकर
कर ली सब तैयारी हमने
ऐसे रात गुजारी हमने!


DHEERENDRA,"dheer"

---------इस रचना पर
अरुण कुमार निगम जी - की टिप्पणी....

हमने इस कविता को पढ़कर
एक कल्पना रथ पर चढ़ कर
उनकी जुल्फ सँवारी हमने
ऐसे रात गुजारी हमने!...

नवीन मनी त्रिपाठी - की टिप्पणी,....

प्रणय कल्प की अमिय पुष्प से .
निर्झर बहते हर विकल्प से ...
सारी रात पुकारी हमने |
ऐसे रात गुजारी हमने ||