सोमवार, 7 मई 2012

कभी कभी.....


कभी कभी

देखी है उनकी आँखें, अपलक कभी-कभी,
सपने भी देखे हमने, दिन में कभी-कभी!

किस सोचमें डूबी, किस बात का है गम,
चेहरा जो उनका देखा, मैंने कभी - कभी!

गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी!

अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!

DHEERENDRA,"dheer"

55 टिप्‍पणियां:

  1. अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
    वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!
    बहुत खूब

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  2. बहुत खूब, यह कभी कभी की दोस्ती तो मार देती है।

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  3. क्या बात है , बहुत खूब !
    " पुराणी दोस्ती बा-ख्याल ,इजलास खाली है
    खुशुबू शराब की फिजां में गिलॉस खाली है "

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    1. न पीते हो न पिलाते हो,खाली गिलॉस दिखाते हो
      फिजां की खुशुबू को छोडो,मयखानें कब बुलाते हो

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  4. अच्छा है, लेकिन कभी-कभी।

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    1. कभी कभी |
      बहुत बदिया प्रस्तुति |
      बधाई धीरेन्द्र जी ||

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  6. अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
    वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!
    bahut sundar panktiyaan ......

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  7. वाह वाह बहुत सुन्दर रचना

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  8. वाह: बहुत खुबसुरत रचना...धीरेन्द्र जी..बधाई

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  9. अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
    वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!


    बहुत खूबसूरत ..

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  10. गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
    हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी!..

    वाह क्या अंदाज़ है ... खूबसूरत सा शेर है मिकम्मल गज़ल का ...

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  11. बहुत सुन्दर रचना .......अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
    वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!

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  12. उम्मीद रखे रहिये
    आ जायेंगे चलते हुए
    तेरे दर पर कभी-कभी !

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    1. दोनों की उम्मीद एक सी,साझा लगे तराना
      घर की मुर्गी दाल बराबर,गाते रहो फसाना

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  13. कभी-कभी सोचता हूँ ऐसा मैं,
    कि काश हो पाए हमारे साथ भी ऐसा, कभी-कभी... :)

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  14. उस गली से निकले थे हम भी कभी कभी
    पर दीदार न हुआ हमें उनका अभी तक कभी
    वाह वाह वाह बहुत खूब |

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  15. गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
    हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी!
    बहुत खूबसूरत अंदाज़े बयान!!

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  16. अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
    वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!
    vaah!!!!kyaa baat hai sunder prastuti......

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  17. अपनी इस सुन्दर रचना की चर्चा मंगलवार ८/५/१२/ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर देखिये आभार

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  18. थी दबी-दबी सी भीतर, इक आग राख में
    उठती थी पा के जल-जल,झोंका कभी-कभी!

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  19. सुंदर रचना ....!
    शुभकामनायें ...!!

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  20. धीरेन्द्र जी.. आपकी रचनाओं में गज़ब की विविधता देखने को मिलती है और हर बार एक नए मानदंड स्थापित करती है.. ऎसी रचनाएं देखने को मिलती हैं कभी-कभी!!

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  21. अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
    वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!


    वाह..... कितने सुन्दर शव्द......:)
    मज़ा आ गया....:)

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  22. वाह क्या बात है!! आपने बहुत उम्दा लिखा है...बधाई

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  23. गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
    हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी!


    वाह ...बहुत खूब...
    अत्यन्त भावपूर्ण रचना...

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  24. आप अच्छा लिख रहे हैं भाई ....
    शुभकामनायें आपको !

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  25. अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
    वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!
    ...बहुत खूब...

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  26. गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
    हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी!

    ....बहुत खूब !..बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  27. गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
    हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी!
    lagata hae, gahari chot kha kar is dar se gayii hae. sundar rachana.

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    1. रचना आपको अच्छी लगी,....आभार नंदित्ता जी

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  28. धीर जी आपका भी जबाब नहीं.
    फोटो की आँखें,बाप रे बाप.

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  29. आप कहे और हम न आये,ऐसी कोई बात नहीं
    'ग़ालिब''होते वो भी रोते,मेरी कुछ औकात नहीं

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    1. आप आये मेरे पोस्ट पर,आपकी जर्रानवाजी है
      सटीक टिप्पणियाँ देना आपकी हाजिर जबाबी है

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  30. गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
    हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी!

    बहुत अच्छी प्रस्तुति!

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  31. बहुत सुन्दर भाव हैं,खूबसूरत रचना।

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  32. अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
    वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी....ye bhi achchi bat hai varna log to kabhi kabhi bhi dosti nahi nibha sakte ab kam ke bhane yad karte hain....

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    उत्तर
    1. गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
      हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी! waah bahut bahut khub ..bahtreen blog ..shukriya

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    2. आभार,.....रंजना जी,....

      हटाएं
  33. देखी है उनकी आँखें, अपलक कभी-कभी,
    सपने भी देखे हमने, दिन में कभी-कभी!

    व्यतीत के दरीचों से अच्छा बिम्ब है वर्तमान को चिढाता सा .

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  34. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से शुभकामनाएँ।

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    1. गमसुम सी जा रही थी , मेरी गली से वो,
      हाँ"मुड के देखती थी, दर मेरा कभी-कभी!
      एक बेहतरीन नज्म। प्यारी प्यारी...... केवल चार दोहों में ही कविता को फिनिस करना कोई आपसे सीखे, सुन्दर. आभार !

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  35. देखी है उनकी आँखें, अपलक कभी-कभी,
    सपने भी देखे हमने, दिन में कभी-कभी
    बहुत खूब.... दिन में देखे सपने ,अधिकतर हकीकत में बदल जाते हैं .... !!

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  36. अनजान मुझसे न थी, पहचान थी पुरानी,
    वह दोस्ती निभाती थी, मुझसे कभी-कभी!

    bhaut khoob sir....

    isi shirhak par meri bhi ek kavita padhein http://www.poeticprakash.com/2009/06/kabhi-kabhi.html

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,