सोमवार, 30 जनवरी 2012

हमको भी तडपाओगे....


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हमको भी तडपाओगे

जिंदगी से हम क्या शिकायत करे
उनसे मिलने की क्यों इबादत करे
खुदगर्जों से ज्यादा और क्या पायेगें
चोट- पर -चोट खाते चले जायेगें

बढ़ गया दर्द हद से ज्यादा मगर
रोते और गुनगुनाते चले जायेगें,|
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फिर भी देता है कोई,अगर जख्म तो
उफ़ करेगें नहीं और हम सहे जायेगें,

खुशियाँ आऐ न आऐ हमे गम नही
अब गमों की ही चाहत हमे कम नही


बढ़ गया दर्द हद से ज्यादा मगर
रोते और गुनगुनाते चले जायेगें,||

हमसे नफरत करो या मोहब्बत करो
हमसे चाहत करो या शिकायत करो
तेरी नफरत हमे तो दिल से मंजूर है.
हमने मोहब्बत की है किये जायेगें

बढ़ गया दर्द हद से ज्यादा मगर
रोते और गुनगुनाते चले जायेगें,||

प्यार में जिनके हम देखो बर्बाद है,
आज हमको मिटाकर वो आबाद है
हो हो आज उनको हमारी कदर
कल पुकारेगे जब हम चले जायेगें

बढ़ गया दर्द हद से ज्यादा मगर
रोते और गुनगुनाते चले जायेगें,||

जाते जाते गुजारिश है इतनी सनम
याद हमको करना तुम्हे है कसम
गर उठे भाव दिल में जो अहसास के,
तुम तड़पोगे, हमको भी तडपाओगे..

बढ़ गया दर्द हद से ज्यादा मगर
रोते और गुनगुनाते चले जायेगे,||

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DHEERENDRA

बुधवार, 25 जनवरी 2012

26 जनवरी आया है....


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26 जनवरी आया है.

नया वर्ष महंगाई लेकर, भ्रष्टाचार को लाया है
लोकपाल क़ानून बिना ही,26 जनवरी आया है

मन ही मन खुशी हो रहे, क़ानून नही ये बन पाया
मिटी देश की खुशियाँ सारी,सबका मन है मुरझाया

खुशहाली हो सारे देश में, शांति व्यवस्था पाने को
लागू कर क़ानून देश में, न्याय व्यवस्था लाने को

बिखर गए सारे सपने , आंबेडकर नेहरू गांघी के
बुत बनकर है देख रहे,लुटते अपने आशियाने को

एक समय अंग्रेजों ने, जी भरकर भारत को लुटा
उनकी फितरत ले नेता, मचा रहे है लूट खसोटा

लोकपाल बन गया होता, दिखता आज नजारा और
अंदर सारे नेता होते भ्रष्टाचारियों को मिलती ठौर

रोजमर्रा की चीजों के, देखो कितने भाव बढ़ रहे
भूखे गरीब पड़े बेचारे, मजबूरी में प्राण तज रहे

माध्यमवर्ग निराश खड़ा, उसको है इज्जत के लाले
वह ही है आधार देश का, जिसने औरो के तन पाले

जो है दाता यहाँ अन्न का,बैठा देखो आज रो रहा
सबकी भूख मिटाने वाला, कैसे अपनी जान दे रहा

कब तक भुगते देश, इन नेताओं के कारनामों को
जनता मौक़ा देख रही है,अबकी सबक सिखाने को

लोकसभा में पास हो गया,राज्यसभा ने लटकाया है
जन लोकपाल क़ानून बिना ही,26 जनवरी आया है


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--DHEERENDRA --



गुरुवार, 19 जनवरी 2012

वाह रे मंहगाई.....


वाह रे महगांई...

लाठी तो चलती रहे, पर आवाज आय,
मंहगाई की मार से, जनता मरती जाय
!

जनता मरती जाय, होय काला बाजारी,
रोते रहे किसान, हंसे देखो ब्यापारी!

नेता और व्यापारी, के कारण मंहगाई आती
होय तभी सुधार, लेय जब जनता लाठी,

भ्रष्ट आचरण घूस से, धन ज्यों काला होय
उसी तरह से झूठ से, मुह भी काला होय,

मुह भी काला होय, फिर फिर सबसे छिपते
पर ये सब क़ानून , नहीं नेता पर लगते,

दशा देश की देख, कष्ट है हमको होता
बनता नेता वही, भ्रष्ट जो ज्यादा होता,

कही अजीरण हो रहा, कही सताए भूख
चिंतन करना चाहिए, कहाँ हो रही चूक,

कहाँ हो रही चूक , देखो कलयुग का खेल
कौन सुधारे देश को, जब राजा जाए जेल,

बहुत बड़ा यह प्रश्न है, मिलता नही जबाब
स्विस बैंक के खातोंका, देगा कौन जबाब,

नेता गण लगने लगे, जैसे बड़ा गिरोह
सभी लोग करने लगे, कुर्सी का है मोह,

कुर्सी का है मोह ,कर रहे आपस में मेल
चुनाव के लिए हो रहा, आरक्षण का खेल,

जनता गूंगी हो गई, है संसद भी मौन
अंधी है सरकार भी, देखन वाला कौन
,

dheerendra...

शनिवार, 14 जनवरी 2012

हमदर्द.....

हमदर्द

मुश्किलों का सामना करना
बड़ा मुश्किल लगता है ,

पावों में हो छाले तो
चलना बड़ा
मुश्किल लगता है,

भंवर में हो नैया तो
किनारा बहुत
दूर लगता है,

उलझा हो काटों में
गर दामन तो
संभलना मुश्किल लगता है,

पतझड का हो मौसम तो
फूलों का
खिलना मुश्किल लगता है,

हवाऐ हो तेज तो
चिराग जलाए
रखना मुशिकल लगता है,

दौरे-गर्दिशाँ में हो आदमी
तो हमदर्द
मिलना मुश्किल लगता है,

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---dheerendra---

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

यह कदंम का पेड़.....

यह कदंम का पेड़

यह कदंम का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदंम का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे,

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ये रचना श्री मति सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखित जो मुझे बहुत पसंद
है आप सभी पाठकों के लिए
प्रस्तुत है,--dheerendra--

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

जिन्दगीं....





















जिंदगी


जिंदगी बस हुक्म सूना देती है,
जो भी जी चाहे,सजा देती है

जिससे उम्मीद नही होती बिलकुल
बस वही चीज दगा देती है,..

आँख के आँसू भी घुलने पाए
उससे पहले कुछ और रुला देती है,

जब भी करता हूँ मै संभलने की कोशिश
मेरे कदमों को जरा और, लडखडा देती है,

जब भी चाहा है सितारों सा चमकना मैंने,
मेरे घर का नन्हा सा दिया भी बुझा देती है

नादाँ दुनिया के दस्तूर पर आती हँसी मुझको
हर शाम मझे रोने की वजह बना देती है,

मेरे मासूम से दिल की हसरतो, छोडो दामन
है कहीं एक धड़कन जो हरदम सदा देती है,

बस यही एक ख्वाहिश है जिंदगी में जीने के लिए,
थोड़ी सी उम्मीद जो दिल में जगा देती है,

ऐ जिन्दगी कैसे तुझे प्यार करू ,
तेरी हर सुबह मेरी उमर कम कर देती है ,

जिंदगी बस हुक्म सूना देती है,

Dheerendra…….