बुधवार, 25 दिसंबर 2013

सूनापन कितना खलता है.



सूनापन कितना खलता है

आँखों से दर्द टपकता है
होंठों से हँसना पड़ता है

दोनों की बाहें थाम यहाँ,जीवन भर चलना पड़ता है

सूनापन कितना खलता है

मझधार में मांझी  रोता है
लहरों के बोल समझता है 

है वेग तेरा भारी मुझपर,पतवार वार को सहता है

सूनापन कितना खलता है 

दिन धीरे-धीरे ढलता है
चेहरे का रंग बदलता है

इस श्वेत श्याम की छाया में,बीता कल छुप कर रहता है 

सूनापन कितना खलता है


रचनाकार  -  विक्रमसिंह (केशवाही) शहडोल,म.प्र.

45 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर !
    बुरा मत मानियेगा
    आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,
    लिखना जरूरी है क्या?

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  2. बहुत सुन्दर और मन को छूती रचना...

    सादर
    अनु

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  3. आपकी यह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी।..वाह!

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  4. क्षमा करें..विक्रम सिंह जी का नाम मैने बाद में पढ़ा। कमेंट संशोधित करते हैं...विक्रम सिंह जी की यह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी।

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26-12-2013 को चर्चा मंच की चर्चा - 1473 ( वाह रे हिन्दुस्तानियों ) पर दिया गया है
    कृपया पधारें
    आभार 

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  6. "आँखों से दर्द टपकता है
    होंठों से हँसना पड़ता है"
    वाह...बहुत ही अच्छी और भावपूर्ण रचना.....बधाई....

    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

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  7. बहुत सुंदर रचना से आपने परिचय करवाया ... आभार
    कृपया विक्रम सिंह जी को हमारी बधाई प्रेषित कीजियेगा
    सादर

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  8. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (25 दिसंबर, 2013) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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  9. दिन धीरे-धीरे ढलता है
    चेहरे का रंग बदलता है

    इस श्वेत श्याम की छाया में,
    बीता कल छुप कर रहता है
    jiwan ki sachai batata post BADHAI

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  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (26-12-13) को चर्चा - 1473 ( वाह रे हिन्दुस्तानियों ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. बहुत खूबसूरत। एकाकीपन सही में बहुत सालता है।

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  13. खाली आंखों को यह रचना पढ़कर शान्ति प्राप्‍त हुई। रचनाकार को प्रणाम।

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  14. मझधार में मांझी रोता है
    लहरों के बोल समझता है

    है वेग तेरा भारी मुझपर,पतवार वार को सहता है

    सूनापन कितना खलता है...........behtareen panktiyan..abhaar.

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  15. बहुत सुंदर मार्मिक रचना

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  16. आँखों से दर्द टपकता है
    होंठों से हँसना पड़ता है....बहुत सुन्दर..

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  17. इस श्वेत श्याम की छाया में,बीता कल छुप कर रहता है

    सूनापन कितना खलता है.
    बहुत सुन्दर.विक्रम जी,
    aabhar sajha karane ke liye !

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  18. एक बहुत ही सुन्दर कविता.. इस कवि से परिचय कराने का आभार!!

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  19. बहुत सुन्दर रचना .. बहत खूब ..

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  20. मन को छूने वाली ... सच से मिलवाती भावपूर्ण रचना ...
    नव वर्ष मंगलमय हो ...

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  21. मेरी रचना को अपने ब्लॉग में स्थान देने के लिए धन्यवाद

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  22. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  23. बहुत सुंदर और प्यारी रचना.....

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  24. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  25. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

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  26. नव वर्ष की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामाये
    अवश्‍य देखिये क्‍योंकि यह आपके सहयोग के बिना संभव नहीं था -
    माय बिग गाइड का सफर 2013

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  27. आँखों से दर्द टपकता है
    होंठों से हँसना पड़ता है....बहुत सुन्दर..

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  28. बहुत सुन्दर रचना .. बहत खूब ..

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,