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बुधवार, 25 दिसंबर 2013

सूनापन कितना खलता है.



सूनापन कितना खलता है

आँखों से दर्द टपकता है
होंठों से हँसना पड़ता है

दोनों की बाहें थाम यहाँ,जीवन भर चलना पड़ता है

सूनापन कितना खलता है

मझधार में मांझी  रोता है
लहरों के बोल समझता है 

है वेग तेरा भारी मुझपर,पतवार वार को सहता है

सूनापन कितना खलता है 

दिन धीरे-धीरे ढलता है
चेहरे का रंग बदलता है

इस श्वेत श्याम की छाया में,बीता कल छुप कर रहता है 

सूनापन कितना खलता है


रचनाकार  -  विक्रमसिंह (केशवाही) शहडोल,म.प्र.