
फिर से होली आई
रस बरसाते रंगों के संग, फिर से आई होली ,
फागुन का त्यौहार निराला भर लो अपनी झोली !
मौज मनाए मिल-जुल कर आओ खेल रचाए ,
लें गुलाल लें रंग फाग का सबसे प्रेम बढाए !
चारों ओर लगा है मेला मौसम बना रंसीला ,
स्नेह रंग की ऋतू आई कर लो तनमन गीला !
पिचकारी का रंग उड़ाएं हँसकर करे ठिठोली ,
ऊँची नीच का भेद भुलाऐ बन जाऐ हमजोली !
हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, हम सब भाई- भाई ,
आपस के मतभेद भुला दो फिर से होली आई !
धीरेन्द्र सिंह भदौरिया
