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बुधवार, 12 मार्च 2014

फिर से होली आई.


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फिर से  होली आई

 रस  बरसाते  रंगों के  संग, फिर  से  आई  होली ,
 फागुन का त्यौहार निराला भर लो अपनी झोली !

 मौज मनाए  मिल-जुल  कर  आओ  खेल रचाए ,
 लें  गुलाल  लें रंग  फाग  का  सबसे  प्रेम  बढाए !

 चारों  ओर  लगा  है  मेला  मौसम  बना  रंसीला ,
 स्नेह  रंग की  ऋतू आई कर लो  तनमन  गीला !


 पिचकारी  का  रंग  उड़ाएं  हँसकर  करे  ठिठोली ,
 ऊँची नीच  का  भेद  भुलाऐ  बन जाऐ  हमजोली !


  हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, हम सब  भाई- भाई , 
 आपस  के  मतभेद  भुला दो  फिर से  होली आई !

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया



बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

होली में ....


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होली में

बहकी बहकी हर कली है होली में
महकी महकी हवा चली है होली में,

उन्मादों कि घटा घनेरी घिर आई
मलय पवन में चंवर झली है होली में,

अमरैय्या में कुहूँ कुहूँ करती कोयल
लगती मन को बड़ी भली है होली में,

रतन चुनरिया पिरियाई है सरसों की
चना चोली, गेंहू बाली है होली में,

रंग भरी पिचकारी स्नेह सौगात लिए
किसने क्या क्या चाल चली है होली में,

जीजाजी साली के गालो को छुकर
ढूढ़ रहे मिस्री कि डली है होली में,

नजर मिलाने तक से जो कतराती थी
वही पड़ोसन गले मिली है होली में,

भाभी देवर की मर्यादा को लेकर
घूंघट घूंघट बात चली है होली में,

पत्तों का नही पता अधर पर अंगारे
या कलमुंही टेसू जली है होली में,

कम्पित है क्यों लौ "धीर" की देहरी पर
फागुन इठलाती चली है होली में,
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--- DHEERENDRA,"dheer"