रविवार, 29 सितंबर 2013

मर्ज जो अच्छा नहीं होता.

मर्ज जो अच्छा  नहीं  होता.
  
  जहाँ पर  प्यार से  बढ़कर कोई  तमगा  नही होता,
     वहाँ पर  भाई का  फिर भाई से  झगड़ा नही  होता |   
   
   सहा  नुकसान पर  हम  बच  गए  मगरूर  होने से, 
     मुनाफो  का  हारिक सौदा भी तो अच्छा नही होता |  

    यही  सीखा  बुजुर्गो  से  इसी  में  शान है अपनी है,  
   अहम का कद  किसी भी  रिश्ते से ऊँचा नही होता |
      
   खुशी  तेरी थी  सो  काँटों में  खुशबू  ढूँढ ली  वरना,
   हो बँटवारा जो फूलों का तो क्या झगड़ा नही होता |

   किसी  बीमार माथे  पर जो  बोसा प्यार  वाला  हो,
     तो फिर  वो कौन सा है  मर्ज जो अच्छा नहीं होता |  
 
रचनाकार  -  @  सुवर्णा शेखर दीक्षित,  छिंदवाडा,

53 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (30.09.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें .

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  2. किसी बीमार माथे पर जो बोसा प्यार वाला हो,
    तो फिर वो कौन सा है मर्ज जो अच्छा नहीं होता |
    Very nice ,कमाल की रचना लिखी है।

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  3. यही सीखा बुजुर्गो से इसी में शान है अपनी है,
    अहम का कद किसी भी रिश्ते से ऊँचा नही होता ........बहुत सुंदर ,....

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  4. यही सीखा बुजुर्गो से इसी में शान है अपनी है,
    अहम का कद किसी भी रिश्ते से ऊँचा नही होता
    बहुत सुन्दर .
    नई पोस्ट : भारतीय संस्कृति और कमल

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  5. वाह किसी बीमार के माथे पर जो प्‍यारा सा अनुभव दिखे तो निश्चित ही तब मर्ज अच्‍छा लगने लगता है।

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - सोमवार - 30/09/2013 को
    भारतीय संस्कृति और कमल - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः26 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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  7. बहुत उम्दा ग़ज़ल,बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ।

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  8. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. हुत उम्दा ग़ज़ल

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  9. उम्दा गजल
    आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [30.09.2013]
    चर्चामंच 1399 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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    1. सुवर्णा दीक्षित25 अक्तूबर 2013 को 9:38 pm

      बहुत शुक्रिया सरिता भाटिया जी..

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  10. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  11. सार्थक काव्य रचना।। मर्ज सच में किसी को भी अच्छा नहीं लगता !!

    नई कड़ियाँ : सदाबहार अभिनेता देव आनंद

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  12. बढ़िया ग़ज़ल है , रचना कार को बधाई !!

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  13. जीवन को सीख देती सौद्देश्य रचना-

    यही सीखा बुजुर्गो से इसी में शान है अपनी( है,)-

    --कृपया इस फ़ालतू है को हटा दें


    अहम का कद किसी भी रिश्ते से ऊँचा नही होता |


    किसी बीमार माथे पर जो बोसा प्यार वाला हो,
    तो फिर वो कौन सा है मर्ज जो अच्छा नहीं होता |

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  14. सहा नुकसान पर हम बच गए मगरूर होने से,
    मुनाफो का हारिक सौदा भी तो अच्छा नही होता ...
    बहुत खूब ... सच कहा है इन्सान बने रहना ज्यादा अच्छा है मुनाफे से ...

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  15. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति...

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  16. बहुत सुन्दर प्रस्तुति .... विशेष तौर पर ये दो शेर बहुत पसंद आये
    सहा नुकसान पर हम बच गए मगरूर होने से,
    मुनाफो का हारिक सौदा भी तो अच्छा नही होता |

    यही सीखा बुजुर्गो से इसी में शान है अपनी है,
    अहम का कद किसी भी रिश्ते से ऊँचा नही होता |.. बहुत खूब!

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  17. बहुत ही उम्दा प्रस्तुति वाह पढवाने के लिए हार्दिक आभार आपका

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  18. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    सहा नुकसान पर हम बच गए मगरूर होने से,
    मुनाफो का हारिक सौदा भी तो अच्छा नही होता |

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  19. पूरी रचना बहुत ही सुंदर है .....
    ये विचार सबके मन में स्थान पायें

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  20. यही सीखा बुजुर्गो से इसी में शान है अपनी है,
    अहम का कद किसी भी रिश्ते से ऊँचा नही होता |
    बहुत खूब aabhar sajha karane ke liye !

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  21. दिल को छूता हुआ , हर शेर लाजवाब . इस शानदार गज़ल पर दाद कबूल कीजिए.

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  22. यही सीखा बुजुर्गो से इसी में शान है अपनी है,
    अहम का कद किसी भी रिश्ते से ऊँचा नही होता |

    अति सुंदर।।।

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  23. यही सीखा बुजुर्गो से इसी में शान है अपनी है,
    अहम का कद किसी भी रिश्ते से ऊँचा नही होता |

    खुशी तेरी थी सो काँटों में खुशबू ढूँढ ली वरना,
    हो बँटवारा जो फूलों का तो क्या झगड़ा नही होता |

    nice lines

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  24. खुशी तेरी थी सो काँटों में खुशबू ढूँढ ली वरना,
    हो बँटवारा जो फूलों का तो क्या झगड़ा नही होता |

    ज़िन्दगी की कहानी कहता

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  25. अहम का कद किसी भी रिश्ते से ऊँचा नही होता |

    bahut khoob .badhai

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  26. लाज़वाब ग़ज़ल ! एक एक शे'र वास्तविकता परक अल्फाज़ों से पिरोया हुआ।
    ......किसी बीमार माथे पर जो बोसा प्यार वाला हो,
    ......तो फिर वो कौन सा है मर्ज जो अच्छा नहीं होता |
    …… बहुत ही लाज़वाब ! जी हाँ ! प्यार का स्पर्श मात्र से ही बड़े बड़े मर्ज़ ठीक हो जाते हैं।
    ज़नाब ''मुनव्वर राना'' साहब भी कहते हैं :
    .......अभी जिंदा है माँ मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा
    .......मैं जब घर से निकलता हूँ, दुआ भी साथ चलती है''…

    आपने भी बहुत ही उम्दा ग़ज़ल लिखी है। दिल से दाद है।
    सादर

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  27. सहा नुकसान पर हम बच गए मगरूर होने से,
    मुनाफो का हारिक सौदा भी तो अच्छा नही होता ...
    ... सच कहा है...बहुत खूब

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  28. सुवर्णा दीक्षित25 अक्तूबर 2013 को 9:37 pm

    बहुत बहुत शुक्रिया आप सभी का :-) धीरेन्द्र सिंह भदौरिया जी , Neeraj Kumar जी, विशेष आभार..

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,