बुधवार, 23 जनवरी 2013

गुलामी का असर,,,


इधर- देखता हूँ उधर-देखता हूँ,
नजरे उठाकर जिधर देखता हूँ! 

मेरा देश  आजाद  हो तो  गया है,
गुलामी का अभी असर देखता हूँ! 


इधर -देखता हूँ उधर -देखता हूँ,

पिताजी  को डैडी, माँ को मम्मी,
इंग्लिश के आगे हिंदी निक्कमी

बहन  पुकारा तो मुह तोप जैसा,
मैडम पुकारा चमत्कार है कैसा!

चेहरा खिलकर कमल देखता हूँ,,

केक काट कर जन्मदिन मनाते,
फूँक मारकर मोमबत्तियाँ बुझाते!

हवन - यज्ञ अपवाद अब हो रहे है,
संस्कार  अपने ही  हम खो रहे है!

घुला  संस्कृति में  जहर देखता हूँ,,

फैशन परेड और सौन्दर्य का मेला,
घूँघट की नारी को कहा जा धकेला!

नक़ल व् बनावट से बाजार ठगते,
सौन्दर्य के मेले भी बेमानी लगते!

लैला  का  होता जिकर देखता हूँ,,,

कुश्ती  कबड्डी  कहाँ  खो गए है,
क्रिकेट  में पागल सभी हो गए है! 

हर  गेंद  पर  सट्टा  है  लगता,
निकम्मे ठलुओं को ये खेल रमता!

बरपा  है ,कैसा ये कहर देखता हूँ,

लोकगीत  छोड़  म्यूजिक  बजाते,
नया साल भी हम विदेशी मनाते!

फूहड़  और  अश्लील  ढंग से  जीते,
नशे में हो धुत रम मस्ती में पीते!

पश्चमी नक़ल का असर देखता हूँ,,

सोने की चिड़िया हम ही को बताते,
गुरू विश्व का भी हम  ही  कहलाते!

मुझे  शून्य  की खोज  पर भी नाज है,
सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत में आज है!


दुश्मनों की आज टेढी नजर देखता हूँ,,

विदेशी  निवेशक  बुलाये  जा  रहे  है,  
किसानो के  हको को कब्जाये जा रहे है!  
अयोध्या का मुद्दा भ्रष्टाचार का किस्सा, 
सियासत  नहीं यह गुलामी का हिस्सा!

बिना सर  के जवानों का धड़ देखता हूँ,, 







 

56 टिप्‍पणियां:

  1. गुलामी कि सोच को इंगित करती एक सार्थक रचना !!

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  2. सामयिक व बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति

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  3. इधर- देखता हूँ उधर-देखता हूँ,
    नजरे उठाकर जिधर देखता हूँ!
    मेरा देश आजाद हो तो गया है,
    गुलामी का इसमे्ं असर देखता हूँ!
    --
    वास्तविकता से परिपूर्ण सुन्दर गीत!

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  4. हमेशा की तरह उम्दा प्रस्तुती !!

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  5. छोड़ा है कुछ भी नहीं, सबको लिया लपेट |
    संस्कार के गाल पर, पड़ते रहे चपेट |
    पड़ते रहे चपेट, आज का नकली जीवन |
    देखो राधा नाच, तेल बहता है नौ-मन |
    परंपरा को तोड़, आधुनिकता तो जोड़ा |
    लेकिन भौंड़ी नक़ल, कहीं का नैहै छोड़ा ||

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  6. यह टीस हर सच्चे हिन्दुस्तानी के दिल में है.
    लेकिन लाचार हैं!

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  7. आपका कहना सही है ....गुलामी मनकी अभी भी बाकी है .....देश से जो निकाल दिया ...तो क्या गज़ब किया ...

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  8. आदरणीय धीरेन्द्र सर सत्य का सुन्दर आईना दिखाया है आपने इस रचना में. हार्दिक बधाई स्वीकारें

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  9. अंग्रेज चले गए ... हमारी मानसिकता को,समझ को गुलाम बनाकर

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  10. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  11. वर्त्तमान स्थिति को आपने हुबहू आईने में उतार दिया -बहुत उम्दा प्रस्तुति

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  12. आज की फैसन हो गयी है | इसे ही लोग आधुनिकता मानाने लगे है | आधुनिक बनाम दुराचार |बहुत सुन्दर |

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  13. लोकगीत छोड़ म्यूजिक बजाते,
    नया साल भी हम विदेशी मनाते!
    फूहड़ और अश्लील ढंग से जीते,
    नशे में हो धुत रम मस्ती में पीते!

    बहुत ही उम्दा प्रस्तुति ...

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  14. आधुनिकता मन के विचारों पर नहीं चढ़ी... उसके ग़लत इस्तेमाल का असर भी उल्टा ही होगा...
    ~सादर!!!

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  15. आज के हालातों पर कटाक्ष करती प्रभावशाली रचना..

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  16. फैशन परेड और सौन्दर्य का मेला,
    घूँघट की नारी को कहा जा धकेला!
    नक़ल व् बनावट से बाजार ठगते,
    सौन्दर्य के मेले भी बेमानी लगते!


    वाह क्या बात है ...बहुत सुन्दर और सटीक

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  17. विदेशी निवेशक बुलाये जा रहे है,
    किसानो के हको को कब्जाये जा रहे है!
    अयोध्या का मुद्दा भ्रष्टाचार का किस्सा,
    सियासत नहीं यह गुलामी का हिस्सा!

    बिना सर के जवानों का धड़ देखता हूँ,,


    bahut hi umda prastuti bhaduria ji ......badhai sweekaren .

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  18. वाकई...हम सब के बीच गुलामी का असर साफ़ नज़र आ रहा है

    लाजबाब रचना

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  19. बहुत सुन्दर गीत .रूपकात्मक परिधान गीत का आकर्षक है मोहक है .शिंदे की नंगई खुली देखता हूँ ,मीरा का सिर अब झुका देखता हूँ .

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  20. आधुनिक समाज पर करारा व्यंग्य। आभार।

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  21. बुराइयों की जगह अच्छाइयों को अपनाएं तो गुलामी नहीं लगेगी।

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  22. इधर- देखता हूँ उधर-देखता हूँ,
    नजरे उठाकर जिधर देखता हूँ!
    मेरा देश आजाद हो तो गया है,
    गुलामी का अभी असर देखता हूँ...बहुत खूब लि‍खा आपने

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  23. इधर- देखता हूँ उधर-देखता हूँ,
    नजरे उठाकर जिधर देखता हूँ!
    मेरा देश आजाद हो तो गया है,
    गुलामी का अभी असर देखता हूँ!

    इधर -देखता हूँ उधर -देखता हूँ,

    पिताजी को डैडी, माँ को मम्मी,
    इंग्लिश के आगे हिंदी निक्कमी
    बहन पुकारा तो मुह तोप जैसा,
    मैडम पुकारा चमत्कार है कैसा!

    आपके पोस्ट सत्यता से परिपूर्ण है। भावभिनी रचना

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  24. आपकी कविता गुलामी के असर को चित्रित करती है। बहुत सुंदर। मुझे प्रोत्साहित करने हेतु आपका आभार।

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  25. इंग्लिश के आगे हिंदी निक्कमी.. करारा व्यंग्य......

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  26. गहरे उतरती पंक्तियाँ, स्तब्ध करतीं।

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  27. आदरणीय धीरेन्द्र जी जबरदस्त समसामयिक कविता रची है आपने करारे कटाक्ष किये हैं आज की सभ्यता पर हार्दिक बधाई आपको

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  28. यही है सांस्कृतिक प्रदूषण.पर घूँघट की नारी क्यों याद आ रही है आपको?
    सब कुछ बुरा नहीं है हाँ,अक्ल की बातें छोड़ करर नकल पर उतारू हो जाना गलत है.

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  29. पिताजी को डैडी, माँ को मम्मी,
    इंग्लिश के आगे हिंदी निक्कमी
    बहन पुकारा तो मुह तोप जैसा,
    मैडम पुकारा चमत्कार है कैसा!
    सोने की चिड़िया हम ही को बताते,
    गुरू विश्व का भी हम ही कहलाते!
    मुझे शून्य की खोज पर भी नाज है,
    सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत में आज है!

    उत्तर देंहटाएं
  30. समसामयिक सत्य, करारा व्यंग्य ,गुलामी का असर साफ़ नज़र आ रहा है ,मीरा का सिर अब झुका देखता हूँ .(hindi me likhne ki jugat kar rahi hu,nahi dikh rahi hai apni bhasa ka khana,gr aap usko yaha jod de to,rahe muskil bahut aasan ho jayegi(please add)

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  31. गहरे ज़ज्बात ..सुंदर लेखन !
    शुभकामनायें!

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  32. क्या करें गलत नेत्रित्व मिले तो देश गलत रास्ते पर ही जाएगा !

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  33. सटीक रचना
    मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    चेतन भगत और भैया जी

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  34. वास्तविकता की सुन्दर व्याख्या करती बहुत ही बेहतरीन रचना,सादर।

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  35. satya ko bayan karti sundar Abhivyakti...
    http://ehsaasmere.blogspot.in/2013/01/blog-post_26.html

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  36. करार व्यंग सार्थक रचना.

    आप सभी को गणतंत्र दिवस पर बधाइयाँ और शुभकामनायें.

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  37. सोने की चिड़िया हम ही को बताते,
    गुरू विश्व का भी हम ही कहलाते!
    मुझे शून्य की खोज पर भी नाज है,
    सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत में आज है!
    सटीक ....

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  38. बहुत सुन्दर और विचारणीय रचना प्रस्तुति!
    गणतन्त्रदिवस की शुभकामनाएँ...!

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  39. सटीक, सामयिक बहुत बढि़या अभिव्यक्ति ...आप को गणतंत्र दिवस पर बधाइयाँ और शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  40. सार्थक रचना.

    आप सभी को गणतंत्र दिवस पर बधाइयाँ और शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  41. केक काट कर जन्मदिन मनाते,
    फूँक मारकर मोमबत्तियाँ बुझाते!
    हवन - यज्ञ अपवाद अब हो रहे है,
    संस्कार अपने ही हम खो रहे है!

    घुला संस्कृति में जहर देखता हूँ,,


    बहुत ही सही कहा है आपने ,,,,
    सुन्दर ,,,,

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ !
    सादर !

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  42. सार्थक अभिव्यक्ति.

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें

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  43. वस्तुस्थिति और कटु सत्य को व्यक्त करती दमदार रचना |

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  44. कटु सत्य बयान करती उत्कृष्ट प्रस्तुति |
    आशा

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  45. गुलामी के असर को चित्रित करती विचारणीय रचना,,,,,

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,