मंगलवार, 27 नवंबर 2012

तड़प,,,

तड़प

जिन्दगी आज कैसी बदहवास सी दिखती है,
तन्हाई  में भी तू  ही तू आस पास दिखती है!

दरिया  में  रह कर भी  मै  प्यासा  रह  गया,
मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!

तेरी यादें आ के  तडपाती तो मयखाने जाता,
मेरी  तबाही  भी  अब  देवदास सी दिखती है!

होठों  पे  शोले  रख कर  कब  तक मुस्कराऊं,
मेरा जिस्म तो अब ज़िंदा लाश सी दिखती है!

दर्द  दिल  में  दफ़न  कर अश्रु  का  आचमन  कर लिया,

मकसद  न रहा जीने का ,जिन्दगी बेजार सी दिखती है!

dheerendra bhadauriya,,,   

57 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द दिल में दफ़न कर अश्रु का आचमन कर लिया,
    कोई मकसद न रहा,जिन्दगी बेजार सी दिखती है!

    सहज सुंदर अभिव्यक्ति!!

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  2. दर्दे-दिल दफना दिया, देह दशा दुर्गेश ।

    बैठ मर्सिया पढ़ रहा, अश्रु हुवे नि:शेष ।

    अश्रु हुवे नि:शेष, देह यह कब्रिस्तानी ।

    अब भी हलचल करे, बुरी है कारस्तानी ।

    ताक-झाँक में तेज, जरा हिलते जो परदे ।

    चमके रोती आँख, आस नव रविकर दर-दे ।।

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  3. जिन्दगी आज कैसी बदहवास सी दिखती है,
    तन्हाई में भी तू ही तू आस पास दिखती है!

    दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!
    bahut khoob dheerendra j umda sher kahe hai aapne badhai aapko , blog ka naya roop bhi accha hai .

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  4. वाह ... बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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  5. बहुत ही सुन्दर रचना ।

    आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (28-11-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  6. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  7. दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!

    वाह वाह .....बहुत खूब।

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  8. बहुत बढ़िया गज़ल....हाँ जिस्म के साथ -दिखती है थोड़ा अटपटा लगा मगर थोड़ी बहुत छूट कवि ले लिया करते हैं :-)

    सादर
    अनु

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  9. दर्द दिल में दफ़न कर अश्रु का आचमन कर लिया,
    मकसद न रहा जीने का ,जिन्दगी बेजार सी दिखती है!
    बहुत सार्थक प्रस्तुति .aabhar

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  10. दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!

    शानदार प्रस्तुति

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  11. बहुत शानदार रचना है धीरेन्द्र जी
    दूर रह कर भी वो है दिल के हर गोशे में समाया सा लगे है
    जिस तरफ देखता हूँ उसका ही सरमाया सा लगे है ....

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  12. दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!


    वाह बहुत खूबसूरत अहसास

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  13. क्या लिखा है आपने हम बार बार पढ़ते ही रह गये ,
    आपकी नज्म में अपनी तड़प तलाश करते ही रह गये।
    ऐसा लगा की लिखी है आपने तड़प मेरे दिल की ,
    हुए जख्म फिर से हरे बर्दाश्त करके ही रह गये।

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  14. क्या ख़ूब व्यक्त किया है अपने एहसासों को !

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  15. वाह सर वाह क्या बात लाजवाब, उम्दा खूबसूरत प्रस्तुति खासकर यह शे'र तो जानलेवा है.
    दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!

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  16. दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!


    बढ़िया शैर है भाई साहब .क्या बात है कोई आशिकी सी आशिकी है .तुम मेरे पास होते हो जब कोई दूसरा नहीं होता .

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  17. "तड़प" एक बेहद सुन्दर प्रस्तुति के आभार।
    मेरी नयी पोस्ट "10 रुपये का नोट नहीं , अब 10 रुपये के सिक्के " को भी एक बार अवश्य पढ़े । धन्यवाद
    मेरा ब्लॉग पता है :- harshprachar.blogspot.com

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  18. बहुत सुन्दर रचना है धीरेन्द्र जी -----

    -----पर पहले दो शे.रों में .....पास और प्यास काफिया है तो आगे के शे'रों में.. सी.. लगाने की आवश्यकता कहाँ है ..काफिया बदल जाता है ...सी... के बिना ही वही 'अ' से काफिया बन रहा है |

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  19. " kripya mykhane se duri banaye rakhen !
    devdas ki halat dekhkr jnhit main ek jaruri salah.......
    baharhaal uprokt prastuti hetu abhar.
    ---------------------------------------------------
    पी .एस .भाकुनी
    ---------------------------------------------------

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  20. भंग हुईं तन्हाइयाँ है, जब आये वो पास।
    मिल जाए मीत तो, पल हो जाता खास।।

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  21. behtarin rachna hai aapki jise bahut hi sundar bhavon se sajaya hai aapne

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  22. दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!

    लाजवाब रचना...बधाई.

    नीरज

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  23. दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!


    वाह बहुत खूबसूरत अहसास

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  24. भंग हुईं तन्हाइयाँ है, जब आये वो पास।
    मिल जाए मीत तो, पल हो जाता खास।

    आपकी हर रचना ताजा, दिल नवाज और बोलती सी लगती हैं। यह रचना भी काफी अच्छी लगी। मेरे पोस्ट पर प्रतिक्रिया देने हेतु आपका आभार, धीरेंद्र जी।

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  25. बढ़िया ग़ज़ल है.
    दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है! .............वाह

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  26. बहुत बढ़िया -

    खुबसूरत प्रस्तुति ।।

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  27. दिल से निकली ...दिल तक पहुंची !
    मुबारक कबूलें!

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  28. बेहतरीन प्रस्तुति।
    सादर- देवेंद्र
    मेरी नयी पोस्ट अन्नदेवं,सृष्टि-देवं,पूजयेत संरक्षयेत पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  29. होठों पे शोले रख कर कब तक मुस्कराऊं,
    मेरा जिस्म तो अब ज़िंदा लाश सी दिखती है!

    शानदार प्रस्तुति !!

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  30. बहुत ही अच्छी कविता |आदरनीय भदौरिया जी सादर नमस्ते |

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  31. खुबसूरत बातें सुन्दर ख्याल

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  32. एक से बढ़कर एक शेर बेहद लाजवाब है

    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://rohitasghorela.blogspot.com/2012/11/3.html

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  33. दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!
    बहुत जबरदस्त शेर और की बात क्या कहूँ पूरी ग़ज़ल ही दिल छू गई दाद कबूल कीजिये धीरेन्द्र भदौरिया जी

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  34. दरिया में रह कर भी मै प्यासा रह गया,
    मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है!

    वाह धीरेंद्र जी, समुंदर सी गहरी बात कह गये.शानदार गज़ल के लिए बधाई.

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  35. होठों पे शोले रख कर कब तक मुस्कराऊं,
    मेरा जिस्म तो अब ज़िंदा लाश सी दिखती है!

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ...
     बांके बिहारी कहाँ मिलेंगे ?

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  36. तेरी यादें आ के तडपाती तो मयखाने जाता,
    मेरी तबाही भी अब देवदास सी दिखती है!

    होठों पे शोले रख कर कब तक मुस्कराऊं,
    मेरा जिस्म तो अब ज़िंदा लाश सी दिखती है!
    शेर जो
    दिल को छू गए
    बहुत सुन्दर

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  37. मेरी निगाहों में सदियों की प्यास दिखती है...वाह..बहुत खूब

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  38. सभी शेर कुछ अलग सा एहसास लिए ... जिंदगी के करीब ...

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  39. सहज सुंदर अभिव्यक्ति!!

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,