रविवार, 7 अक्तूबर 2012

तेरी फितरत के लोग,,,

तेरी फितरत के लोग,,,
 
खुद रहते शीशे के घर में
पत्थर लिये खड़े क्यों लोग,

अपनी खिड़की बंद किये है
घर दूजे का झाँके क्यों लोग,

है जमीर खुद का सोया फिर
आइना लिये खड़े क्यों लोग,

जन्म लिया जिस धरती में
उससे फिर भागे क्यों लोग,

जब हमे थाम लिया धरती ने
आसमां फिर तकते क्यों लोग,

ऐ"धीर"अपनी बदल ले फितरत
नहीं यहाँ तेरी फितरत के लोग,,,


dheerendra,"dheer"  

55 टिप्‍पणियां:

  1. it has a deep meaning ... जो न समझे वो अनाड़ी है
    http://pandeygambhir.blogspot.in/इस ब्लॉग पर आयें

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  2. जब हमे थाम लिया धरती ने
    आसमां फिर तकते क्यों लोग
    ......बहुत ही सुन्दर धीरेन्द्र जी बधाई स्वीकारें

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    1. namaskaar dheerendra ji
      bahut sundar gajal

      है जमीर खुद का सोया फिर
      आइना लिये खड़े क्यों लोग,..........waah kya sach ka aaina dikhaya hai aapne ,bahut dino baad post aayi par sarthak ho gayi .badhai .

      is baar mere do geet aapki pratiksha kar rahe hai :)

      हटाएं
  3. है जमीर खुद का सोया फिर
    आइना लिये खड़े क्यों लोग,

    बेहतरीन अभिव्यक्ति!!

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  4. है जमीर खुद का सोया फिर
    आइना लिये खड़े क्यों लोग....बहुत बढ़ि‍या..बधाई

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  5. छोटी बहर की बहुत उम्दा ग़ज़ल!
    शेअर करने के लिए शुक्रिया!

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  6. बहुत ही प्रभावशाली पंक्तियाँ..शुभकामनायें..

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  7. बेहतरीन ग़ज़ल धीरेन्द्र सर क्या बात है

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  8. ऐ"धीर भाई "अपनी बदल ले फितरत
    नहीं यहाँ तेरी फितरत के लोग,,,
    लाजबाब !

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  9. उम्दा गज़ल ....अपनी फितरत जैसा कोई मिलेगा भी नहीं ..

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  10. मरम्मत और करते तो ग़जल बनती,
    जरा हिम्मत दिखाते तो नज़र मिलती ।

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  11. खुद के अंदर झांकना भी सबसे पहले जरुरी है. उम्दा गज़ल धीरेन्द्र जी.

    बधाई.

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  12. है जमीर खुद का सोया फिर
    आइना लिये खड़े क्यों लोग,...सोचते ही नहीं कि अपना अक्स ही दिखेगा

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  13. बहुत बढ़िया गजल..
    खुद रहते शीशे के घर में
    पत्थर लिये खड़े क्यों लोग,
    सभी शेर बहुत ही बढ़िया है..
    :-)

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  14. फितरत न बदले कभी, सर्प साधु कवि दुष्ट |
    फुफकारे हुंकार दे, रहे प्रीत या रुष्ट ||

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  15. " आइना लिये खड़े क्यों लोग,

    बेहतरीन अभिव्यक्ति......

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  16. सभी पंक्तिया बहुत ही सुन्दर धीरेन्द्र जी बधाई ....

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  17. गाफिल जी अति व्यस्त हैं, हमको गए बताय ।

    उत्तम रचना देख के, चर्चा मंच ले आय ।

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  18. रहा नहीं जीवन भी अपना
    पर-जीवन पर जीते लोग!

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  19. अपनी खिड़की बंद किये है
    घर दूजे का झाँके क्यों लोग,
    sahi hai ....

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  20. बेहतरीन भावों से सजी हुई इन अच्छी पंक्तियों के लिए बधाई!

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  21. हीरा चाहे जहाँ रहे
    कीमत नहीं बदल सकती है
    कर्म बदल देता है किस्मत
    फितरत नहीं बदल सकती है....

    सुंदर दार्शनिक रचना हेतु बधाई स्वीकार करें.

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  22. Click here for Myspace Layouts
    रविवार, 7 अक्तूबर 2012
    तेरी फितरत के लोग,,,
    तेरी फितरत के लोग,,,

    खुद रहते शीशे के घर में
    पत्थर लिये खड़े क्यों लोग,

    अपनी खिड़की बंद किये है..(..(हैं )....झांकें हैं उस घर में लोग ...........)
    घर दूजे का झाँके क्यों लोग,

    है जमीर खुद का सोया फिर
    आइना ...(आईना )...लिये खड़े क्यों लोग,

    जन्म लिया जिस धरती में .(...(पे )....फिर धरती से क्यों भागे लोग .....)
    उससे फिर भागे क्यों लोग,

    जब हमे (हमें )थाम लिया धरती ने ..........(हमें थाम लिया धरती ने जब ,आसमां फिर तकते क्यों लोग )
    आसमां फिर तकते क्यों लोग,

    ऐ"धीर"अपनी बदल ले फितरत
    नहीं यहाँ तेरी फितरत के लोग,,,

    बढ़िया रचना है दोस्त .छेड़खानी की है भली लगे या बुरी ,नीयत नहीं है बुरी ....

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  23. मै खडा यहा तु बन्‍दे सोया है कहा

    नमस्‍कार धीरेन्‍द्र जी

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  24. जब हमे थाम लिया धरती ने
    आसमां फिर तकते क्यों लोग,

    बहुत खूब...

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  25. है जमीर खुद का सोया फिर
    आइना लिये खड़े क्यों लोग,waah bahut khub ...bahut sahi kaha

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  26. है जमीर खुद का सोया फिर
    आइना लिये खड़े क्यों लोग...
    बेहतरीन अभिव्यक्ति .

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  27. सच्चाई का आइना दिखाती बेबाक रचना...बहुत असरदार व सार्थक !

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  28. जब हमे थाम लिया धरती ने
    आसमां फिर तकते क्यों लोग,

    बेबाक रचना

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  29. अपने घर की खिडकी बंद करके दूसरों के घर में ताक झामक करना कुछ लोगों की आदत होती है । बहुत सुंदर गज़ल ।

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  30. रचना लिखने में आपका कोई जोड़ नही है.आप काफी परिपक्व हो चुके हैं.

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  31. है जमीर खुद का सोया फिर
    आइना लिये खड़े क्यों लोग,...जी बिलकुल.

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  32. साफ़ सरल शब्दों में भी आप कहर ढाते हैं :-)

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  33. फितरत वाले तो हैं, लेकिन फितरत यह है कि हाथ में आइना है, लेकिन अपना चेहरा कोई देखना ही नहीं चाहता।

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  34. वाह बहुत खूब..हर शेर एक से बढ़कर एक ....

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  35. शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
    पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति .

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  36. आप भी बस आप हैं.
    लोगो का क्या ?

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार धीरेन्द्र जी.

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  37. खुद रहते शीशे के घर में
    पत्थर लिये खड़े क्यों लोग,
    सुंदर ! अति सुंदर................

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  38. जब हमे थाम लिया धरती ने 
    आसमां फिर तकते क्यों लोग
    ......बहुत ही सुन्दर .......
    .... बेहतरीन रचना ....

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  39. उम्दा प्रस्तुती।

    आपके इन शब्दों का तो कोई तोड़ नही है जी।

    ऐ"धीर"अपनी बदल ले फितरत
    नहीं यहाँ तेरी फितरत के लोग,,,

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,