सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

हम देख न सके,,,

हम देख न सके,,,

रोज पढते रहे अखबार हम देख न सके,
आप कब हो गए सरकार हम देख न सके,!

हमने तो आपको अपने करीब देखा था,
बीच में कांच की दीवार हम देख न सके,!

उनकी आँखों में जहर, प्यार मेरी आँखों में,
और मिलती रही हर बार हम देख न सके,!

हम तो दीवाने थे सबसे ही गले मिल बैठे, 

गुलों में खार थे पर उन्हें हम देख न सके,!

इस "धीर" का था इल्जाम जमाने भर पर,
और खुद अपना ही किरदार हम देख न सके,!

.................dheerendra,dheer,


59 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति... आभार

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    1. namaskaar dheerendra ji
      bahut umda gajal ...aapki post par ana sadaiv sarthak hota hai , maaf kijiyega swasth ke chalte kai dino se nahi aa saki .

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  2. बहुत बढ़िया...
    बेहतरीन गज़ल...

    सादर
    अनु

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  3. गजब फोटो-
    बधाई धीर भाई -

    हुस्न-इश्क को भूल जा, रविकर पकड़ सलाह |
    सूक्ष्म-दृष्टि अतिशय विकट, अभी गजब उत्साह |
    अभी गजब उत्साह, कहीं ना आह निकाले |
    यह कंटकमय राह, पड़ो ना इनके पाले |
    पड़ जाए गर धीर, ध्यान में रखो रिश्क को |
    शुभकामना असीम, भूल जा हुश्न-इश्क को ||

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  4. ....आप इतने हैं असरदार ,हम देख न सके !?

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    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. उनकी आँखों में जहर, प्यार मेरी आँखों में,
    और मिलती रही हर बार हम देख न सके,!

    vaah,,,,bhaut lajbab gajal,,,,badhai

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  7. इस "धीर" का था इल्जाम जमाने भर पर,
    और खुद अपना ही किरदार हम देख न सके,!

    इसे पढ़कर एक दोहा याद आ गया...

    बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिल्या कोई
    जो दिल देखा आपना मुझसे बुरा न कोई

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  8. बेहतरीन सृजन शब्द व भाव भी ...बहुत -२ बधाईयाँ जी ...l

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  9. हम तो दीवाने थे सबसे ही गले मिल बैठे,
    आस्तीनों में थे फनकार हम देख न सके,!

    ...वाह! बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति..

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  10. बड़ी प्यारी गजल लगी मुझे ..........

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  11. रोज पढते रहे अखबार हम देख न सके,
    आप कब हो गए सरकार हम देख न सके,!....अब करना है क्या, ये भी सोच न सके

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  12. उनकी आँखों में जहर, प्यार मेरी आँखों में,
    और मिलती रही हर बार हम देख न सके,!
    bahut hi sundar rachna badhai

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  13. हम तो दीवाने थे सबसे ही गले मिल बैठे,
    आस्तीनों में थे फनकार हम देख न सके,!

    बेहतरीन गज़ल...

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  14. इस "धीर" का था इल्जाम जमाने भर पर,
    और खुद अपना ही किरदार हम देख न सके,!
    बहुत सुन्दर गज़ल लायें हैं इस मर्तबा आप .

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  15. रोज पढते रहे अखबार हम देख न सके,
    आप कब हो गए सरकार हम देख न सके,!

    बहुत सुंदर ....

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  16. Gazal vakai bahut behtareen likhi hai.abki baar to kafi alg likha hai.lekin ek baat samajh me nhi aayi ''आस्तीनों में थे फनकार हम देख न सके,! kyun ki Fankaar Lugat me sangitkaar ya Gaayak ko kahte hain.saanp ko kisi bhi Juban me fankar nhi kaha jata.khas kar urdu me to iska matlab kuch or nikalta hai.

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  17. बहुत खूबसूरत ...लिखा है आपने !
    मुबारक कबूलें .....

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  18. गज़ल बहुत उम्दा है .... फनकार शब्द पर आमिर जी लिख ही चुके हैं .... फनकार का अर्थ हुनरमंद होता है ।

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  19. उनकी आँखों में जहर, प्यार मेरी आँखों में,
    और मिलती रही हर बार हम देख न सके,!

    बहुत सुंदर, क्या कहने


    जब भी समय मिले, मेरे नए ब्लाग पर जरूर आएं..
    http://tvstationlive.blogspot.in/2012/09/blog-post.html?spref=fb

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  20. उनकी आँखों में जहर, प्यार मेरी आँखों में,
    और मिलती रही हर बार हम देख न सके,-----इस ग़ज़ल की जितनी तारीफ की जाय कम होगी ये शेर तो ग़ज़ब का है !
    हम तो दीवाने थे सबसे ही गले मिल बैठे,
    आस्तीनों में थे फनकार हम देख न सके,!----यहाँ फनकार होने से भाव बदल गया (सांप के लिए )फनदार लिख दें या आस्तीनों में थी फुफकार तो भी चलेगा

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  21. इस "धीर" का था इल्जाम जमाने भर पर,
    और खुद अपना ही हम देख न सके,!

    प्यार में अक्सर नज़रें धोखा खा जाती हैं या फिर उम्र का असर दिखता हो

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  22. वाह||
    बहुत ही बेहतरीन गजल..
    सुन्दर...
    :-)

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  23. इस "धीर" का था इल्जाम जमाने भर पर,
    और खुद अपना ही किरदार हम देख न सके,!
    ..बहुत उम्दा....

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  24. लाजवाब!
    इलजाम के बीच अपना किरदार कौन देखना चाहता है।

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  25. "उनकी आँखों में जहर, प्यार मेरी आँखों में,
    और मिलती रही हर बार हम देख न सके,!
    लाजवाब.........
    बहुत खूबसूरत .........



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  26. गैरों का काम है,
    गैर ही जानें
    नहीं मलाल कि रहे
    खुद को देखते !

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  27. उनकी आँखों में जहर, प्यार मेरी आँखों में,
    और मिलती रही हर बार हम देख न सके, .......बहुत सुन्दर गज़ल..आभार..

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  28. कांच की दीवार तो सदियों से है ...कभी किसी ने भी देखी ही नहीं

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  29. कमाल की गज़ल है धीरेन्द्र जी.. एक एक शेर बेमिसाल!!

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  30. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  31. इस "धीर" का था इल्जाम जमाने भर पर,
    और खुद अपना ही किरदार हम देख न सके,!
    WAAH धीरेन्द्र जी ज़माने भर पर इल्जाम लगाने के बाद खुद
    आपना किरदार देख ना सके बहुत खूब कहा है
    हार्दिक बधाई

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  32. हम तो दीवाने थे सबसे ही गले मिल बैठे,
    गुलों में खार थे पर उन्हें हम देख न सके,!bahut khoob ...vaise sare hi gazab dha rahe hain .....

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  33. खुद अपना ही किरदार हम देख न सके.........!
    सटीक पंक्ति !

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  34. लाजवाब रचना धीरेंदर जी, बहुत उम्दा ....

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  35. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (07-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  36. सुंदर भाव। पढ़कर मन त्रिप्त हो गया कभी मेरे ब्लौग http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com पर भीआना अच्छा लगेगा।

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  37. वाह धीरेन्द्र सर क्या बात है लाजवाब बेहद उम्दा

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  38. अक्सर ऐसे ही चूक हो जाती है..सुंदर भाव!

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  39. हमने तो आपको अपने करीब देखा था,
    बीच में कांच की दीवार हम देख न सके,!

    इस "धीर" का था इल्जाम जमाने भर पर,
    और खुद अपना ही किरदार हम देख न सके,!

    वाह !!!!!!!!! धीरेंद्र जी

    खूबसूरत गज़ल के खूबसूरत शेर

    मर जाना मंजूर है, यार करे गर वार
    हम मिलते दिल खोल कर, उनके हृदय कटार.

    उत्तर देंहटाएं
  40. हमने तो आपको अपने करीब देखा था,
    बीच में कांच की दीवार हम देख न सके,!

    इस "धीर" का था इल्जाम जमाने भर पर,
    और खुद अपना ही किरदार हम देख न सके,!

    वाह !!!!!!!!! धीरेंद्र जी

    खूबसूरत गज़ल के खूबसूरत शेर

    मर जाना मंजूर है, यार करे गर वार
    हम मिलते दिल खोल कर, उनके हृदय कटार.

    उत्तर देंहटाएं
  41. इस "धीर" का था इल्जाम जमाने भर पर,
    और खुद अपना ही किरदार हम देख न सके,!
    अत्यन्त सुन्दर भाव....

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  42. हमने तो आपको अपने करीब देखा था,
    बीच में कांच की दीवार हम देख न सके,!
    बहोत खूब धीरेंद्र जी ।

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  43. कमाल है.
    धीरेन्द्र जी आप देखने से कैसे चूक गए.
    चलिये अच्छा हुआ.
    इसी बहाने सुन्दर कविता का सर्जन हुआ.
    हार्दिक आभार जी.

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