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शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

बदले जो न ढंग.( दोहे )

बदले जो न ढंग.
 
हाथ गुलाल लिए खड़े,मोहन  बहुत  उदास ,
राधा  पहुँची  डेट पर, और  किसी  के साथ !

राधा के  मन और है, मोहन  के  मन  और ,
इसके मन  भी चोर है, उसके मन  भी चोर !

होली दिवाली  भाय न, भाये अब  न बसंत ,
मोहन  के  मन अब  बसे, बैलेटाइन  सन्त !

पहले  चाट  पसंद  थी ,अब  पसंद  है  चैट ,
मनमोहन   की  बाँसुरी , बना  है  इंटरनेट !

राधा, मीरा, रुकमणी, सब  जाने  यह बात ,
इस मोहन  का वायदा, नहीं किसी के साथ !

देश ,वेश , भाषा  गई , बचा  है  केवल  रंग ,
यूँ  ही  गुम  हो  जावगे. बदले  जो  ना  ढंग !


धीरेन्द्र सिंह भदौरिया,