बदले जो न ढंग.
हाथ गुलाल लिए खड़े,मोहन बहुत उदास ,
राधा पहुँची डेट पर, और किसी के साथ !
राधा के मन और है, मोहन के मन और ,
इसके मन भी चोर है, उसके मन भी चोर !
होली दिवाली भाय न, भाये अब न बसंत ,
मोहन के मन अब बसे, बैलेटाइन सन्त !
पहले चाट पसंद थी ,अब पसंद है चैट ,
मनमोहन की बाँसुरी , बना है इंटरनेट !
राधा, मीरा, रुकमणी, सब जाने यह बात ,
इस मोहन का वायदा, नहीं किसी के साथ !
देश ,वेश , भाषा गई , बचा है केवल रंग ,
यूँ ही गुम हो जावगे. बदले जो ना ढंग !
धीरेन्द्र सिंह भदौरिया,
