रविवार, 5 फ़रवरी 2012

बोतल का दूध...


बोतल का दूध

एक मैडम थी,
एक था उनका बच्चा
बच्चा था उम्र में बहुत कच्चा,
बच्चा जब भूख से रोने लगा
आसुओं से आखोँ को धोने लगा
मैडम ने थमा दी बच्चे को एक बोतल
उसमें डब्बे का दूध था टोटल,
बोतल में दूध था कुछ पानी
मैडम की अगड़ाई ले रही थी जवानी,
उस बनावटी दूध पीकर बच्चा सोने लगा
ये देख कर मेरा मन रोने लगा,....

समय यूँ ही ढलता गया,
वर्ष पर वर्ष बढ़ता गया
कुछ वर्षों बाद मैडम मुझसे मिली
थोड़ी शरमाई थोड़ी सकुचाई
फिर मुझसे बोली
धीरे से अपनी जवान खोली
भाई साहब एक सवाल पूंछू
अगर प्रश्न लगे खराब,
तो आप मत देना जबाब
ये आज कल के बच्चे बड़े होकर
माँ-बाप के प्रति
अपना कर्तव्य क्यों भूल जाते है
मैंने कहा-?
दोष तो आप जैसी माताओं का है
जो अपना कर्तव्य भूलकर,
अपने बच्चे को "बोतल का दूध" पिलाते है...
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DHEERENDRA

58 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसी ही अब हमारी जीवन-शैली हो गई है,जीने के लिए समय नहीं है !
    ...हम रिश्तों को ग्लैमर से कमतर मानते हैं !

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  2. कविता के माध्यम से आपने एक सही सीख दी है

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  3. आप ने बिलकुल सही जवाब दिया...पहले अपनी गलतियों पर ध्यान देना चाहिए!

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  4. कल 06/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  5. सार्थक लेखन...
    शुक्रिया.

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  6. धीरेन्द्र जी!! खोते मातृत्व और बिलखते बचपन की मार्मिक अभिव्यक्ति!!

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  7. करारी बात कही है साहब। बहुत शानदार।

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  8. bahut karara vyang karti kavita. sahi kaha aapne maa bhi to apne saundarya ko barkrar rakhne ke liye apna farj bhool rahi hain parntu yahi unki sabse badi bhool hai is kavita me yah bhi jod dete ki kuch samay baad vahi stri stan cancer ki bimari se peedit mili.

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  9. करारा जवाब दिया है और सहीभी कहा है।

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  10. रचना में बढ़िया सन्देश दिया है !

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 06-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  12. माँ की ममता!
    बच्चा क्या जानेगा!
    बहुत सार्थक प्रस्तुति!

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  13. कटु सत्य की बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन प्रस्तुति,

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  14. aisa mat kaho bhai, bottle ka doodh hum jaan bhujh kar nahi pilate ,mai janti hu jab mai apne bache ko dudh nahi pila pai to mera mann kitna roya tha, sab maaye aisi nahi hoti

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  15. हां जी ....हम भी गीता जी कि बात से सहमत हैं ....बच्चे सिर्फ माँ का दूध ना पीने से बिमुख नहीं होते ....इसके और भी बहुत से कारण होते हैं ....
    परिस्थिति और विडम्बनाएँ..वक्त वक्त पर बदलती रहती हैं

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  16. वाह ...वाह ......बिकुल सटीक व्यंग्य है आपका.......शानदार |

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  17. बिलकुल सही जवाब दिया सटीक बात कही है सर!

    इंतज़ार ख़त्म हुआ धीरेन्द्र जी
    लम्बे अन्तराल के बाद नई पोस्ट पर आपका स्वागत है
    ......अनाम रिश्ते
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in/2012/02/blog-post.html#links

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  18. Dosh samay ka bhi hai...jahaan kamana majboori hai..aur botal ka doodh zaroorri hai

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  19. karara vyang swachh shabdon mein...bahut khoob...
    prabhavshaali shaili....umda rachna

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  20. जैसा बोओगे, वैसा पाओगे (जैसा करोगे ,वैसा भरोगे ) चरितार्थ हुआ. बोतल का दूध 'रंग' दिखा रहा होगा .

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  21. एक कटु सत्य...लेकिन बच्चों के व्यवहार के लिये केवल बोतल का दूध ही जिम्मेदार नहीं, आसपास का वातावरण,बदलते पारवारिक और सामाजिक मूल्य आदि का भी एक महत्वपूर्ण रोल है..बहुत सुंदर रचना..

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  22. एक कटु सत्य..पर बढ़िया सन्देश ....

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  23. ... और फिर बुढापे में रोते हैं कि बच्चे उनकी परवाह नहीं करते !!!!!!

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  24. बढिया संदेश छिपा है रचना में।
    बेहतरीन।

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    1. Jahan,jahan commenta ke neeche comment box hai,wahan mere blogse mai comment box khol nahee pa rahee hun.Isi karan yahan pe comment kar rahee hun. kashama karen!

      Bahut achha sandesh hai. Ab botal ke doodh ka chalan badal raha hai,warna meree saas kee umr kee aurten botal ke doodh ke paksh me hua kartee theen.

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  25. खूबसूरत प्रस्तुति पर बधाई ।

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  26. बहुत बढ़िया! हकीकत को आपने बड़े ही सुन्दरता से शब्दों में पिरोया है! जैसी करनी वैसी भरनी! सही जवाब दिया आपने!

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  27. चेतावनी है ... शब्द चित्र खड़ा कर दिया आपने इस रचना में ...

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  28. बेहतरीन ...लाजबाब प्रस्तुति !
    सचमुच बहुत ऐसी माँ हैं जो आधुनिकता में
    खो कर अपना कर्त्तव्य भूल रही है !
    आभार !

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  29. अच्छा व्यंग्य है .इस हाथ दे उस हाथ ले .

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  30. bahut achchhi tarah aapne likha hai. par kai baar aajivika ki mazburi ke karan kayee maa ko aisa karna padta hai, kam hi maa hai jo apni sundarta banaye rakhne ke liye aisa karti hai. kai baar kartavya nibhaane ke baad bhi santaan tiraskaar kar deti hai. isi samaj ka ye bhi sach hai.

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  31. दोष तो आप जैसी माताओं का है
    जो अपना कर्तव्य भूलकर,
    अपने बच्चे को "बोतल का दूध" पिलाते है..।
    धीरेंद्र जी, आपकी हर कविता समय के साथ संवाद करती सी प्रतीत होती है । आपके पोस्ट पर आकर बहुत कुछ जानने का अवसर मिलता है । मेरे नए पोस्ट पर आप आमंत्रित हैं । धन्यवाद .

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    1. बहुत खूब ... बोतल के दूध में स्तन के दूध की शक्ति कहाँ से होगी ... धीरेन्द्र भाई ... उम्दा रचना

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  32. बहुत सार्थक प्रस्तुति । एक कटु सत्य का वर्णन किया है आपने ।

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  33. बिल्कुल सही बात कही आपने जैसा बोयेंगे वैसा ही काटेंगे,ये तो प्रकृति का नियम है।

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  34. अब पछताए क्या करें --चिड़िया चुग गयी खेत !बहुत अच्छा ! बधाई

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  35. तभी तो दुश्मन को ललकार कर कहते हैं 'तुने अपनी माँ का दूध पिया हो तो आ करले दो दो हाथ'
    फिर कहेंगें 'बोतल का दूध पिया हो तो जा दूर बैठ माथे पर रखकर हाथ'

    आपकी सुन्दर प्रस्तुति की प्रशंसा करने के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास.

    आभार..आभार..आभार...

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  36. आधुनिक युग पर कड़वे वचन... उम्दा

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  37. यह एक कटु सत्य का खुलासा है एस रचना में
    आशा

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  38. आपने बचपन के मोहक किलकारी को बेहतरीन शब्द दिया है...
    सादर..!

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  39. Dheerendr ji behad sundar prastuti ...bilkul majedar dhang se.....jitani tareef karu kam hogi .

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  40. "जब बोये पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से खाए"
    इसी संदेश को आपने अपनी कविता के माध्यम से बखूबी संप्रेषित किया है। एक सार्थक और सुंदर रचना।

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  41. "जब बोये पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से खाए"

    इस नसीहत को बड़े ही मर्म के साथ आपने संप्रेषित किया है। एक सुंदर और सार्थक रचना।

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  42. बहुत अच्छा लिखा आपने, बेहतरीन प्रस्तुति
    शुक्रिया.

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  43. सुन्दर कविता में करारा व्यंग.... बहुत खूब......

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,