रविवार, 4 दिसंबर 2011

जूठन.....

जूठन

विवाह-समारोहों के समय नित्य प्रति कहीं न कहीं प्रीत भोज में शामिल होना पड़ता है,ऐसेही एक रिश्तेदार के यहाँ विवाह में शामिल होने के लिए मुझे ग्वालियर जाना पड़ा, मेहमान अधिक होने के कारण सारी व्यवस्था नगर के सुंदर से बड़े एक विवाह सदन में किया गया था, शादी की सारी व्यवस्था में आधुनिकता खुमार छाया था, मै भी बुफे पर खाने का आनंद लेरहा था,अचानक बाहर गेट पर किसी की जोरजोर से रोने की आवाज सुनाई पड़ी, कौतुहल बस मै गेट गया वहाँ मैंने देखाकि १०-१२वर्षीय बच्ची को तीन चार सूटधारी मिलकर मार रहेथे बच्ची के मुहसे खून निकल रहा था और वह डरके मारे थरथर काँप रही थी,उसके बहती आँखों में दया की भीख के भाव थे, मैंने पूछा,भाई ऐसी क्या बात हो गई है जिसके कारण इस बच्ची के साथ इतनी मार पीट कर रहे हो?उन सूटधारी सज्जनों में से कोई जबाब देता, उसके पूर्व ही बच्ची रोते-रोते जोर से बोली,'बाबूजी, ये मेरी बात ही नही सुनते है,बाबूजी,माँ की कसम,मैंने ये हलुए वाली कटोरी स्टाल से नही उठाई थी इन्ही साहबोंमें से किसीने बाहर मेरे सामने कचरे की बाल्टी में ये हलुए वाली कटोरी फेकदी थी,बस बाबूजी, मैंने वही उठा ली,
मुझे नहीं मालूम था बाबूजी,कि "जूठन" फेकने के लिए है, खाने के के लिए नहीं,
यह सुनते ही सूटधारियो की नजरें शर्म के मारे नीचे झुक गई,और मै सोच रहा था, कि जूठन फेकने के वाले सभ्य समाज के ठेकेदारों को सजा कौन देगा......
--------dheerendra....इस लेख पर आपके विचार आमंत्रित है.........

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक ... विचारणीय प्रस्तुति

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  2. Oh..!! Bada durbhagya hai hamare desh ka ki itne sabhya samaaj mein aise log bhi maujood hain.

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  3. हमारा उत्सवीय आनन्द ऐसा देख कर ध्वस्त क्यों नहीं हो जाता, मार्मिक।

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  4. बहुत अच्छी जानकारी....ज्ञानवर्धन के लिए आभार.। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

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  5. मार्मिक ||

    सुन्दर प्रस्तुति ||

    बधाई ||

    http://terahsatrah.blogspot.com

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  6. सुन्दर प्रस्तुति | मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  7. अत्यंत मार्मिक सत्य है ये हमारे सभ्य एवम असंवेदनशील समाज का | इस तरह के आयोजनों में हम अपनी वेशभूषा व् अपनी हाई सोसायटी के स्तर प्रदर्शन करने के लिए तत्पर रहते हैं | जबकि हम सीना तान कर दावा करते हैं कि हमारे बच्चे हमारे देश के भविष्य हैं इन पर हमारे राष्ट्र की जिम्मेदारी है कितना अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर रहें हैं हम एक बच्चे के सम्मान की तो रक्षा कर नहीं सकते उसे देश कि रक्षा करना क्या सिखायेंगे |

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  8. bahut sahi kaha usne, ke use nahi pata tha ki joothan faikne k liye hai khane ke liye nahi ...

    boht hi achi kahani

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  9. एक छोटी सी बच्ची जो भूख से छटपटा रही थी बिना किसी कसूर के उसे उन लोगों ने इतना मारा ! उस बच्ची की बात बिना सुने ही उस पर इतना ज़ुल्म किया गया ! कितने बेरहम लोग हैं हमारे देश में जिनमें दया नाम की कोई चीज़ ही नहीं है! आख़िर बच्ची का क्या कसूर? भला वो क्या जाने की जूठन क्या है? उसने तो अपनी भूख मिटाने के लिए फेकी हुई मिठाई को उठाया और बदले में उसे पीटा गया! ये तो नाइंसाफी है ! न जाने हमारे देश में ऐसे हज़ार बच्चे हैं जिनके साथ इससे भी बत्तर सुलूक किया जाता है! मार्मिक प्रस्तुती!

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  10. ओह! ऐसी परिस्थितियां वास्‍तव में निंदनीय हैं ...विचारणीय प्रस्‍तुति ।

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  11. सोचने को बाध्य करती आपकी ये रचना ...पता नहीं अपना ये समाज और उसकी ये सोच कब बदलेगी .....

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  12. when we think on this matter...some people treats father as a servent....
    pitiful

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  13. ये सब देख कर कुछ ही समय के लिए शर्म आती है और फिर सब भूल जाते हैं ... कितने संवेदनहीन हो गए हैं हम ...

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  14. only few persons can feel other person's pain. you have wonderful emotions and you short story is very nice..although painfull

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  15. मार्मिक रचना .....
    शुभकामनायें आपको !

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,