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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

सागर,,,

सागर
उन्माद अगर पाना चाहे ,मंजिल नई अपनाऐगें
 हम छोड़ चले सूनी राहें,सागर से हम बतियाऐगें,

अपने भी साथ नहीं देते ,सपनों की औकात कहाँ
 सच्चाई में कड़वाहट है,अपनेपन की न बात यहाँ,

बुजदिल न बनें चलते जाएँ,सागर में गोते खायेगें
 हम छोड़ चले सूनी राहें , सागर से हम बतियाएगें,

जाने कितने आँसू पोछे,दुत्कार मिली हर आहट पर
 कहना क्या,कहानी का ,इकरार किया गरमाहट पर,


रिश्ते यह अजब अनूठे है,सागर से झील मिटाएगें

 हम छोड़ चले सूनी राहें , सागर से हम बतियाएगे,

घर है सूना,गलियाँ सूनी ,सूने-सूने त्यौहार लगे
  मनघट सूना,पनघट सूना,सूना सूना संसार लगे, 


सूने-पन को खत्म करें,हम लहरों के संग गाएंगे
 हम छोड़ चले सूनी राहें,सागर से हम बतियाएंगे,

  dheerbndra bhadauriya