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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

रिश्वत लिए वगैर...

रिश्वत लिए वगैर...

टिप्पणी नही करेगें अब बिना लिये वगैर,
हम दाद नही देगें  , कुछ खाए पिए वगैर!

टिप्पणी विहीन रचना को श्रीहीन समझिए,
त्यौहार मुहर्रम का हो  , जैसे ताजिऐ बगैर!

लेख लिख  टुकड़े में कर कविता है बनाते
कविताए नही चलेगी,तुकबंदी किये बगैर 

क्या  हो रहा आज, कविता के नाम पर
गजलें नही चलेंगी बिना काफिऐ बगैर!

उत्तर की प्रतीक्षा में , है एक प्रश्न यह भी
कवि क्यों नही सुनते,कविता पिए बगैर!

जीवन  के हर क्षेत्र में रिश्वत है जरूरी
फिर रहे धीर क्यों रिश्वत लिये बगैर!


DHEERENDRA,"dheer"