बसंत ने अभी रूप संवारा नहीं है
कुहासों ने घूंघट उतारा नही है,
अभी मेरे प्रियतम का इशारा नहीं है!
कुहासों ने घूंघट उतारा नही है,
अभी मेरे प्रियतम का इशारा नहीं है!
किरणों का रथ लगता थम गया,
सूरज ने अभी पूरब निहारा नही है!
चारो दिशाओं में धुंधलके है फैले,
पूनम के चाँद को गंवारा नहीं है!
चाँदनी रातें फीकी सी लग रही,
मेरे प्रियतम ने दीप उजारा नही है!
हेमन्त जा रहा शिशिर आ रहा,
बसंत ने अभी रूप संवारा नहीं है!
धीरेन्द्र सिंह भदौरिया,
