हमने कितना प्यार किया था.
अर्ध्द- रात्रि में तुम थीं मैं था, मदमाता तेरा यौवन था ,
चिर - भूखे भुजपाशो में बंध, अधरों का रसपान किया था !
हमने कितना प्यार किया था !!
ध्येय प्रणय-संसर्ग मेरा था, हृदय तुम्हारा कुछ सकुचा था ,
फिर भी कर स्वीकार इसे तुम,तन मन मुझपे वार दिया था !
हमने कितना प्यार किया था !!
थकित बदन चुपचाप पड़े थे ,मरू-थल में बरसे सावन थे ,
हम दोनो ने एक दूजे को , प्यारा सा उपहार दिया था !
हमने कितना प्यार किया था !!
रचनाकार - विक्रम सिंह, केशवाही,शहडोल,
अर्ध्द- रात्रि में तुम थीं मैं था, मदमाता तेरा यौवन था ,
चिर - भूखे भुजपाशो में बंध, अधरों का रसपान किया था !
हमने कितना प्यार किया था !!
ध्येय प्रणय-संसर्ग मेरा था, हृदय तुम्हारा कुछ सकुचा था ,
फिर भी कर स्वीकार इसे तुम,तन मन मुझपे वार दिया था !
हमने कितना प्यार किया था !!
थकित बदन चुपचाप पड़े थे ,मरू-थल में बरसे सावन थे ,
हम दोनो ने एक दूजे को , प्यारा सा उपहार दिया था !
हमने कितना प्यार किया था !!
रचनाकार - विक्रम सिंह, केशवाही,शहडोल,