मंगलवार, 2 सितंबर 2014

वजूद



काश- तुम्हारे भी एक बेटी होती
प्यार से उसका नाम रखते ज्योती,
सहमी सहमी सिमटी सी-
गुलाबी कपड़ों लिपटी सी-
टुकुर टुकुर निहारती,
जैसे बेरहम दुनिया को देखना चाहती,
उसका हंसना बोलना और मुस्कराना,
तुम्हारा प्यार से माथे को सहलाना,
गाल चूमकर नाम से बुलाते-
गोद में उठाकर सीने से लगाते-
तो तुम्हरा दिल खुशियों से नाच उठता,
कितनी ठंडक पडती कितना सकून मिलता,
नन्हे नन्हे पैरों से चलने की आहट

हंसना रोना और उसकी खिलखिलाहट,
गोद में उठाकर लोरी सुनना
उंगली पकडकर चलना सिखाना,
तोतली जबान से कुछ कहने की चाहत
समाज के दोगली बातों से आहात-
जैसे कहना चाह रही हो-?
बेटे और बेटी में इतना फर्क,
इसमें हम बेटियों का क्या कसूर
एक बार हमारे पंख लगाकर के देखो
खुले आसमान में उड़ाकर के देखो-
हम क्या नहीं कर सकती॥?
लक्ष्मीबाई, से लेकर मदरटेरसा, तक
इंदिरा गांधी,से लेकर कल्पना चावला तक
ये भी तो किसी की बेटियां थी,
बेटियां समाज की धडकन होती है
दो कुलों के बीच रिश्ता जोड़कर-
घर बसाती है,
माँ बनकर इंसानी रिश्तों की
भावनाओ से जुडना सिखाती है,
पर तुमने-?
पर जमने से पहले ही काट डाला
शरीर में जान-?
पड़ने से पहले ही मार डाला,
आश्चर्य है.?
खुद को खुदा कहने लगे हो
प्रकृति और ईश्वर से
बड़ा समझने लगे हो,
तुम्हारे पास नहीं है ?
कोई हमसे बड़ा सबूत,
हम बेटियां न होती-?
न होता तुम्हारा वजूद......

जिन्दगी के  हर जशन को अधूरा पाओगे,
अगर बेटियों के आगमन से इतना कतराओगे,
जीवन का ये अनमोल सुख कैसे पाओगे,,,,,,,,

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dheerendra singh bhadauriya,,,,,

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

आज के दोहे.

आज के दोहे.

नई  सदी  से  मिल  रही,  दर्द  भरी  सौगात   
बेटा   कहता   बाप  से , तेरी   क्या  औकात !!

अब  तो अपना  खून भी, करने लगा कमाल    
बोझ समझ माँ बाप को, घर से रहा निकाल !!

 पानी आँख में  न रहा, शरम  बची  ना लाज     
कहे   बहू  अब  सास  से, घर  में  मेरा  राज !!

भाई   भी  करता   नही, भाई  पर  विस्वास   
 बहन  पराई   हो   गई,  साली  खासमखास !!

मंदिर  में  पूजा  करें,  घर   में   करे  कलेश   
 बापू  तो   बोझा  लगे, पत्थर   लगे   गणेश !!

बचे  कहाँ   वो  लोग  है, बचा  कहाँ  ईमान   
 पत्थर के  भगवान्  हैं, पत्थर  दिल  इंसान !!

फैला   है  पाखंड  का, अन्धकार  सब  ओर  
 पापी  करते  जागरण, मचा  मचाकर  शोर !!

रचना whatsApp से

शनिवार, 28 जून 2014

ब्लोगिंग के तीन साल,


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

ब्लोगिंग के तीन साल,

 

  तीन  साल   लिखते   हुआ ,"काव्यान्जली " में  पोस्ट   
दो  सौ  अडसठ  मिल  गए, अब  तक  मुझको  दोस्त, 


 अब तक मुझको दोस्त,दोसौ पांच रचनाये लिख डाली   
दस  हजार एक  सौ  छियान्बे , टिप्पणियाँ  भी  पाली, 


 एक  लाख  पाठको  का  मिला , मुझको  स्नेह  अपार   
 सभी    स्नेही   ब्लागरों    का ,  बहुत   बहुत   आभार,  

 

 २८ जून २०११ से आज तक उन सभी ब्लॉगरों का आभारी हूँ,जिन्होंने मेरे पोस्ट पर आकर अपनी अनमोल टिप्पणियों से मेरा हौसला बढ़ाया, आशा करता हूँ आगे भी इसी तरह प्यार स्नेह बनाए रखेगें,,,


मेरी लिखी कुछ रचनाओं के पसंदीदा  लिंक्स,,,,,



1 -...: स्वागत गीत....

2 - ...: बेटी,,,,,

3 - ...: ऐसे रात गुजारी हमने....

4 -...: कवि,...

5 - ...: आँसुओं की कीमत....

6 - ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

7 -...: तुम्हारा चेहरा....

8 -...: तब मधुशाला हम जाते है,...

9 - ...: बसंती रंग छा गया,...

10 - ...: होली में ....

11 - ...: कामयाबी....

12 - ...: हमको भी तडपाओगे....

13 - ...: जिन्दगीं....

14 -...: जनता सबक सिखायेगी....

15 - ...: शब्द....

16 - ...: हम दो हमारे दो ....

17 -...: वजूद....

18 -...: माँ की यादें....
 

19 -...: एक बूँद ओस की....
 
20 - ...: वाह गाँधी....

dheerendra bhadauriya

मंगलवार, 20 मई 2014

प्यारी सजनी

प्यारी  सजनी

तुम  न्यारी तुम  प्यारी  सजनी
लगती  हो  पर- लोक  की  रानी
  नख  से  शिख   तक  तुम  जादू  
 फूलों  सी  लगती   तेरी  जवानी,

केशों    में    सजता    है  गजरा
नैनों   में   इठलाता  है   कजरा
खोले   केश   सुरभि  है   बिखरे
 झुके  नैन   रच   जाए   कहानी,


माथे पर  सौभाग्य  की  बिंदिया
जिसके गिरफ्त में मेरी निदिया
 पहने  कानों में  चन्दा  से कुंडल 
  और  तन  पर भाये  चूनर धानी, 

कर  कमलों  में  कंगना   सजते
पैरों   में  बिछिया  नूपुर   बजते
 संगीत  तेरे  आभूषणों  का  सुन 
 बलखाये  कमर चाल  मस्तानी,

निकले  होठोंसे  हँसीं का  झरना
यौवन  पुष्पों का  उठना  गिरना
देखकर  तेरी   मदमस्त  अदाये
 गढ़  जाए  न  कोई  नई  कहानी,


dheerendra bhadauriya,,,,,

शनिवार, 10 मई 2014

आम बस तुम आम हो

आम बस तुम आम हो 

हे आम  के बृक्ष उदार  तुम, उपकार  करते  हो  सदा
भगवान्  ने  तुमको रचा है,करने  जगत  का फायदा

तुम  हो  मदन के  बाण , तुम में खूबियाँ  बे शुमार है
पथिकों   विहंगों  प्रेमियों  को, तुम्हीं  से  बस प्यार है

बौर आते  ही बसंत  में, तब  सुगंध  सब  को  मोहती
विखर उठती  छटा अनुपम जो मधुलिका सी सोभती

पत्थर  चले  डंडे   पड़े  राजा   फलों  में  विख्यात  हो
रहते  सदा  चुप  देखते ,जैसे  तुम्हे  कुछ  हुआ न हो

ठंडक   सहो , गर्मी   सहो ,  बर्षात   तो  सहते   सदा
ओले  गिरे  आँधी चले , विचलित  न  होते  तुम कदा

औषधि  गुणों  की खान  तुम  हो, पंछियों  के आस रे
शान्ति  मिलती   यात्रियों  को, सुखद  एक  प्रवास  रे

पूजनीय   उदार   तुम   हो   कल्याणकारी   ताज  हो
 तुमसे बने,जो 'आम 'खाये ,हितकारियों  का  राज  हो 

उपयोग  बाहुलता  लिये , हे आम  बस तुम  आम  हो
यह चिरातन  सत्य है , कि तुम  शान्ति के  पैगाम हो
 
dheerendra singh bhadauriya